Tuesday, November 22, 2016

इंदिरा के कदम पर बढ़ते मोदी लेकिन------



अखिलेश अखिल 
सबसे पहली बात ये है कि  इंदिरा गाँधी और नरेंद्र मोदी में कोई समानता है ?  कह सकते है की दोनों में समानता है।  जिस तरह से इंदिरा सहस भरे फैसले लेती थी उसी तरह मोदी जी भी फैसले ले रहे है।  नोटबंदी के फैसले को कमतर नहीं माना नहीं जा सकता। इंदिरा गांधी गजब की साहसी और निडर थी और मोदी जी भी लगभग उसी तरह से सहस और निडरता दिखाते जा रहे है।  इंदिरा गांधी के ऊपर आपातकाल लगाने का आरोप लगते रहे है।  इंदिरा  का यह निर्णय पूर्णतः अपनी राजनीति बचाने और सता में बने रहने के लिए था।  देश का आकार प्रकार , और देश की जैसी हालत तब  थी  इंदिरा ने आपातकाल लगाने का सहस किया था।  लेकिन ऐसे आरोपो से विलग इंदिरा ने इस देश के लिए जो किया अब तक किसी प्रधानमन्त्री के नाम उतने तमगे नहीं है।कांग्रेस के विभाजन, प्रिवीपर्स की समाप्ति, रुपए के अवमूल्यन, बैंकों के राष्ट्रीयकरण, बांग्लादेश के निर्माण, स्वर्ण-मंदिर पर हमले और आपात्काल जैसे साहसिक कार्यों से  इंदिरा जी को याद किया जा सकता है। ठीक मोदी जी ने भी नोटबंदी का फैसला इंदिरा गाँधी की तर्ज पर ही किया है।  अगर मोदी जी के इस फैसले का सर देश पर ठीक ठाक पड़  गया तो देश का मिजाज भी बदल जाएगा और देश की हालत भी बदल जायेगी।    पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का शताब्दि-वर्ष  शुरु हो गया है।  आज कांग्रेस की सत्ता होती तो यह शताब्दी वर्ष धूमधाम से मानता।  लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।  आजाद भारत में इंदिरा गांधी के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता।  साहसी कामो ने ही इंदिरा गांधी को लौह-महिला बना दिया था। इतने जबर्दस्त कामों के लिए असीम साहस तो चाहिए ही, उसके साथ-साथ पूरी तैयारी भी चाहिए, जैसी कि रजवाड़ों के विलय और हैदराबाद व कश्मीर के लिए सरदार पटेल ने दिखाई थी। लेकिन साहस की इस अति ने ही इंदिराजी को ध्वस्त कर दिया। न सिर्फ आपात्काल के बाद वे बुरी तरह से हारीं, बल्कि स्वर्ण मंदिर कांड के बाद उन्हें अपनी जान से भी हाथ धोने पड़े।  
मोदी ने जैसे ही नोटबंदी की घोषणा की जितनी तारीफ़ की जाए काम ही होगी।  लेकिन लगता है यह सब जल्दी में लिया गया फैसला था।  इसकी तैयारी नहीं की गयी थी।  तैयारी के साथ और चाक चौबंद होकर नोटबंदी की जाती तो संभव था की इस देश के सारे ढंढारीयो की कमर टूट जाती।  मोदी जी की सोच भी यही रही होगी।  लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है।  अर्थक्रांति लाने के लिए धैर्य की जरुरत है। हमारे देश में आज भी संपत्ति की गोपनीयता का कानून है।  इस कानून के जरिये किसी संपत्ति की जानकारी हमें नहीं दी जाती।  किसी के रिटर्न फाइल को भी हम देख नहीं सकते।  बसभी जानते है की पूरा  फाइल गलत तथ्यों से भरे होते है।  इस देश  का कोई भी आदमी सही रिटर्न फाइल नहीं भरता।  यहाँ तक कि राष्ट्रपति से लेकर तमाम मंत्री और संत्री भी।  जरूरत थी इस पर भी चोट करने की।  इस गोपनीय कानून पर से रोक हैट जाए तो आजाद भारत की सच्ची तस्वीर सामने आ जायेगी।  उम्मीद है की मोदी जी नजर इस तरफ भी होगी। 
लगता है मोदी जी को आज भी देश गुजरात ही नजर आता है।  यही वजह है की मोदी जी जल्दबाजी में निर्णय लेकर फस से गए है। इंदिरा गांधी को केंद्र सरकार को अंदर-बाहर से चलाने का लगभग 20 साल का अनुभव था लेकिन मोदी कई अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह बिल्कुल नौसिखिए हैं। इसमें शक नहीं कि इंदिरा गांधी ने आपात्काल अपनी कुर्सी बचाने के लिए थोपा था जबकि मोदी ने नोटबंदी देशहित के लिए की है। उनका निजी स्वार्थ कुछ भी नहीं है। लेकिन उनका हाल इंदिराजी से भी बदतर हो सकता है।  हमारे देश में हर खेल के पीछे राजनीति छुपी होती है।  नोटबंदी के पीछे भी राजनीति है।  देश का कल्याण और प्रदेशो की चुनावी राजनीति।  साफ़ है कि मोदी जी के इस निर्णय से मध्यमवर्ग थोड़ा खुश आता दिख रहा है।  लेकिन यही माध्यम वर्ग जो पूरी तरह से मौकापरस्त है समय आने पर उलटी दाव भी खेल जाता है।  अमीर और गरीब लोग नोटबंदी से सबसे ज्यादा परेशान  हुए है।  चुनावी राजनीति में इसका असर पड़  सकता है।  और अगर दाव उलटा पड़ गया तो मोदी जी की पूरी अर्थक्रन्ति की बात धरी की धरी रह जायेगी।  लाकतंत्र के साथ इंदिरा ने आपातकाल लगाकर जो खेल किया उससे ज्यादा कुछ इंदिरा ने देश को दिया भी।  आज रूस के साथ हमारी जो दोस्ती है उसके मूल में इंदिरा की राजनीति को सलाम किया जा सकता है।  याद कीजिये रुसी राष्ट्रपति ब्रेझनेव के साथ इंदिरा की बैठक को।  उस समय अमेरिका भारत को सता रहा था।  प्रिवी पर्स की राजनीति को  याद कीजिये।  समाजवाद की राजनीति वही से शुरू हो गयी थी।  याद कीजिये बांग्लादेश निर्माण को।  हम इंदिरा के योगदान को कैसे भूल सकते है।  मोदी जी उसी राह पर चलते रहिये।  सत्ता  जाए या रहे देश हमेशा आपको याद रखेगा।  देश को सुधार दीजिये। 

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