Saturday, November 26, 2016

नोटछपाई की रहस्य्मयी दुनिया का सच


अखिलेश अखिल 
 हम नहीं जानते की हमारी सरकार नोटबंदी के जरिये हमारा कल्याण कर रही है या फिर कोई राजनितिक और आर्थिक खेल कर रही है। देश की जनता को मोदी जी पर यकीं है।  इसलिए की कही उसकी दरिद्रता दूर हो जायेगी।  चुकी  हमारे देश में नोटबंदी को लेकर जहां दुनिया भर में शोर है वही देश के भीतर ग्रेट गेम इंडिया नामक संस्था की रपट  देश की नोटबंदी  के पीछे यूरोपियन देशो के खेल और मुद्रा की ततिलस्मि दुनिया के करेंसी किंग कहे जाने वालो की तरफ इशारा कर रहे है। माया -मोह से परे  प्रधानमन्त्री मोदी जी की तरफ देश देख रहा है कि इस नोटबंदी से चाहे जो परेशानी उठानी पड़  रही है अगर देश का भला हो जाए तो सोने पर सुहागा।  बीजेपी के अन्य नेताओ से लोगो को यह उम्मीद थी भी नहीं।  लेकिन  जो रपट सामने आ रही है वह बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है। 
         सरकार ने अभी हाल ही में 500 और 1000 रूपये के नोटों को बन्द करके 2000 के नये नोटों को पेश करने का निर्णय लिया हैबताया जा रहा है कि ऐसा करने से नकली नोटों  [एफ आई सी एन]  की सहायता से होने वाले आतंकवाद की फंडिंग को रोकने और विध्वंसक गतिविधियां जैसे जासूसीहथियारों की तस्करीड्रग्स और प्रतिबंधित वस्तुओं की कालाबाजारी को रोकने में मदद मिलेगीसाथ ही ऐसे दावे भी हैं कि इससे हमारी अर्थव्यवस्था के सामानांतर कालेधन की काली छाया को नष्ट करने में कामयाबी मिलेगीउद्देश्य तो सार्थक हैंलेकिन क्या हमारी नई मुद्रा की छपाई में वही कम्पनियाँ हैं जो कालीसूची में डाली गयीं थीं और जिन कंपनियों की मिलीभगत से पाकिस्तान में नकली मुद्रा छपने के कारखाने चलते थे?

वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान नकली मुद्रा रैकेट का पता लगाने के लिए सीबीआई ने भारत – नेपाल सीमा पर विभिन्न बैंकों के करीब 70 शाखाओ पर छापेमारी कीउन शाखाओं के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा था कि जो नोट सीबीआई ने छापें में बरामद किये हैं वो बैंकों को रिजर्व बैंक से मिले हैंउसके बाद सीबीआईने भारतीय रिज़र्व बैंक के तहखानो में छापेमारी में जाली 500 और 1000 मूल्यवर्ग का भारी गुप्त कैश पाया थालगभग वैसे ही समान जाली मुद्रा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा भारत में तस्करी से पहुँचाया जाता थाअब सवाल है कि यह नकली मुद्रा भारतीय रिज़र्व बैंक के तहखानो में कैसे पहुंची? 2010 में सरकारी उपक्रमों संबंधी (COPU) संसदीय समिति चौक गयी कि सरकार द्वारा पूरे देश की आर्थिक संप्रभुता को दांव पर रख कर कैसे अमेरिकाब्रिटेन और जर्मनी को लाख करोड़ की छपाई का ठेका दिया गया|
अमेरिकी नोट कंपनी (यूसए)थॉमस डे ला रू (ब्रिटेन) और गिसेक एंड डेवेरिएंट कंसोर्टियम   (जर्मनी) ये वो तीन कम्पनियां हैजिसे भारतीय मुद्रा की छपाई करने के लिए ठेका दिया गया थाइस घोटाले के बाद रिज़र्व बैंक ने अपने वरिष्ठ अधिकारी को तथ्य तलाशने के लिए डे ला रू के प्रिटिंग प्लांट हैम्पशायर (ब्रिटेन) भेजारिज़र्व बैंक अपनी सुरक्षा कागज की आवश्कताओं का 95% का आयात उसी कंपनी से करता था जो कि कम्पनी के लाभ का एक तिहाई थाफिर भी भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा डे ला रू को नये अनुबन्ध से दूर रखा गयाडे ला रू के इस झूठ के कारण सरकार द्वारा इसे काली सूची में डाल दियाजिसके कारण 2000 मीट्रिक टन कागजप्रिटिंग प्रेस और गोदामों सब ऐसे ही पड़े रह गएइस असफलता के बाद डे ला रू के सीईओ जेम्स हंसीजो इंग्लैंड की रानी का धर्म-पुत्र है ने बहुत ही रहस्यमय तरीके से कम्पनी छोङ दीअपने सबसे मूल्यवान ग्राहक भारतीय रिजर्व बैंक” को खोने के बाद डे ला रू के शेयर लगभग दिवालिया हो गएइसके फ्रेंच प्रतिद्वन्दी ओबेरथर ने इसका अधिग्रहण करने के लिए नीलामी की कोशिश की जिससे कंपनी किसी तरह बचीवित् मंत्रालय के अज्ञात अधिकारियों ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को भेजी शिकायतों में अन्य कम्पनियों का भी उल्लेख कियाइसमें फ्रेंच फर्म अर्जो विग्गिंसक्रेन एबी (यूसए) और लाविसेंथल (जर्मनी) शामिल है! हालांकि अभी हाल ही में जनवरी 2015 में गृहमंत्रालय ने जर्मन कंपनी लाविसेंथल को प्रतिबंधित कर दियाजो कि आरबीआई को बैंक नोट पेपर बेचने के साथ-साथ पाकिस्तान को भी कच्चा नोट बेच रही थीऐसे में सवाल उठता है कि कौन हैं ये रूपया छापने वालेऔर वो भारत सरकार के मुद्रण तक पहुचे कैसेकालीसूची में और दिवालियापन के कगार पर होने के बावजूद भी वो लोग कैसे भारतीय बाज़ार में दुबारा प्रवेश करने की तैयारी कर रहें हैंसबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आम भारतीयों को इसके बारे में कुछ पता क्यों नही हैयहाँ पर हम पैसे बनाने वालो का एक छोटा सा किस्सा रख रहे हैं|

मुद्रा कारोबार में प्रमुख क्षेत्र हैं कागजप्रिंटिंग प्रेसनोटस्याही और इंटीग्रेटर्सइन कामों का जिम्मा सेवा देने वाली कंपनी के कार्यों में आता हैंऐसा माना जाता है कि यह ब्यापार यूरोप में बहुत ही गुप्त तरीके से लगभग दर्ज़न भर कम्पनियो द्वारा किया जाता हैसाथ ही इन कम्पनियो की शुरुवात 15वीं सदी के बाद से मानी जाती हैडे ला रू कंपनी का इतिहास और इसके संचालन और कंपनी के संयंत्र का किस्सा इसके 1000 साल पहले से हैडे ला रू ब्रिटिश हुकूमत का आधिकारिक क्राउन एजेंट थाजो कि अभी भी बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के लिए नोट प्रिंटिंग का काम करता है|   आधिकारिक इतिहास के अनुसार भारत में बैंक नोट मुद्रण सरकार द्वारा 1928 में भारत सुरक्षा प्रेस की स्थापना के साथ शुरू किया गयानासिक में प्रेस के चालू होने तक भारतीय करेंसी नोट यूनाइटेड किंगडम के थॉमस डे ला रु जियोरी द्वारा मुद्रित किया जाता थास्वतंत्रता के बाद भी 50 सालों से भारत अपने रुपये की छपाई डे ला रू से खरीदी हुई मशीन से कर रहा हैजो की एक स्विस परिवार गिओरी द्वारा संचालित होती है और नोट मुद्रण ब्यापार पर उसका लगभग 90% का नियंत्रण हैलेकिन 20वीं के अन्त तक कुछ ऐसी घटनाएँ हुई जिसने की सब कुछ बदल के रख दिया|

इंडियन एयरलाइन्स फ्लाइट IC-814 का अपहरण
24 दिसम्बर 1999 को भारतीय एयरलाइन्स फ्लाइट IC 814 का कुछ गनमैन द्वारा अपहरण कर लिया गयाअपहरणकर्ताओं ने विमान को विभिन्न लोकेशन से उड़ाने का आदेश दियाअमृतसरलाहौर और दुबई से होते हुए अपहरणकर्ताओं ने अन्त में उसे कान्धार (अफगानिस्तान) में उतारने का आदेश दिया जो कि उस समय तालिबान के नियंत्रण में थाउनके लिए जो इस घटना से वाकिफ नही हैवो अजय देवगन की फिल्म ज़मीन” देखकर याद कर सकते हैंजो इस फिल्म में नही दिखाया गया और जिसे लोग जानते भी नहीं वह था उस फ्लाइट में मौजूद एक रहस्यमय आदमीउसका नाम था रोबेर्टो जियोरी और वही डे ला रु का मालिक थाजिसकी वर्ल्ड करेंसी प्रिंटिंग व्यापार पे लगभग 90% आधिकार है| 50 वर्षीय गिओरीजिसके पास इटली और स्विट्ज़रलैंड की दोहरी नागरिकता हैस्विट्ज़रलैंड के सबसे आमीर आदमियों में एक है|
स्विट्ज़रलैंड ने अपने मुद्रा राजा के अपरहण से निपटनेउसकी सुरछित रिहाई और नई दिल्ली पर दवाब डालने के लिए हवाई अड्डे पर अपना एक विशिष्ट दूत भेजास्विस प्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाईजैक के दो दिन बाद रविवार २६ दिसम्बर को स्विस विदेश मंत्री श्री जोसफ डिस की अपने भारतीय समकक्ष जसवंत सिंह के साथ काफी लम्बी टेलीफोनिक बात चीत हुईस्विस सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए राजधानी बर्न में अलग से एक सेल बनाई और एक विशिष्ट दूत हैंस स्टादर को कान्धार भेजा जो नियमित रूफ से बर्न’ को वापस रिपोर्ट करता थास्विस अख़बारों की रिपोर्ट की मानें तो विशिष्ट विमान से स्विट्ज़रलैंड तक सुरक्षित वापसी के दौरान और बाद में भी रोबेर्टो जियोरी स्विस सरकार के विशिष्ट सुरक्षा घेरे में रहा|
लेकिन यहाँ इस कहानी में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी लापता हैयह माना जाता है कि रोबेर्टो जियोरी की सुरक्षित रिहाई के लिए फिरौती भारत सरकार द्वारा चुकाई गयी थीइस मुद्दे पर न सिर्फ राजनीतिक वर्गों से बल्कि खुफिया तंत्र ने भी आवाज़ उठाई थीयह बात कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए ही बहुत शर्मनाक है और निकट भविष्य में संसद को हिला देने की अहमियत रखती हैजो भी उद्येश्य (अपरहण का) रहा होकिन्तु भारतीय जेलो में बन्द आतंकवादियों के सुरक्षित रिहाई के लिए प्लेन अपहरण की रिपोर्ट लिखी गयीकारवाई दिनों तक चली और बाद में भारत से तीन आतंकवादियों की रिहाई की सहमति पर बात बनी – मुश्ताक अहमद जरगरअहमद उमर सईद शेखऔर मौलाना मसूद अज़हरये आतंकी बाद में मुंबई आतंकी हमले सहित अन्य आतंकी कार्यवाही शरीक रहे|
क्या डे ला रु नई रुपये के नोटो की छपाई में शामिल है?
इकनोमिक टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार नोट्स मोटे तौर पर अत्यन्त गोपनीयता के साथ मैसूर में छपी हैजबकि कागज जिस पर मुद्रण किया गया है वह इटलीजर्मनी और लन्दन से आऐ थेअधिकारियो के अनुसार प्रिंटिंग अगस्त-सितम्बर में शुरू हुआ और 2000 रुपये के लगभग 480 मिलियन और 500 रुपये की लगभग एक समान संख्या में नोट मुद्रित किये गएभारतीय रिज़र्व बैंक मैसूर में भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेडऔर डे ला रु जियोरी के साथ अनुबन्ध है जो कि वर्त्तमान में के केबीएजियोरीस्विट्ज़रलैंड नाम से है| दि हिन्दू की खबर के मुताबिक भारत बैंक नोट पेपर यूरोपीय कंपनियों लौइसेन्थल जर्मनीडी ला रु  यू के)क्रेन स्वीडनअरजो विग्गिन्स ,फ्रांस और नीदरलैंड से आयात करता है|
भारत सुरक्षा एजेंसी के अनुसार भारत ने 2014 में दो यूरोपीयन कंपनियों को कालीसूची में डाल दिया क्योकि उन्होंने समझौते में शामिल सिक्योरिटी पेपर की प्रिंटिंग की शर्तों को पाकिस्तान के साथ साझा कर दिया थालेकिन बाद में प्रतिबन्ध हटा लिया गया और कंपनियों को कालीसूची से हटा दिया गयाक्योंप्रतिबन्ध हटाने का कारण जो दिया गया वह कुछ यूँ था: एक अधिकारी ने बताया कि ये कम्पनियां 150 सालों से काम कर रही है वे एक देश की जानकारी दूसरे देश से साझा कर के अपने व्यापार में बाधा नही डालेंगी”| इन कम्पनियों में से कुछ छोटे देशों के लिए नोट प्रिंट करती हैजाँच के बाद यह पाया गया की दोनों फर्मो ने सुरक्षा शर्तों से समझौता नही किया था और इसलिए प्रतिबंघ हटा लिया गया|
हालांकि अपने ही जाँच में ब्रिटेन के ही सीरियस फ्रॉड ऑफिस ने पर्दाफाश किया था कि डे ला रु के कर्मचारियों द्वारा जान बूझ कर अपने 150 ग्राहकों में से कुछ के लिए कागज विशिष्ट परीक्षण प्रमाण पत्र का गोलमाल हुआ थाहाल ही में पनामा पेपर में ये भी पता चला की डे ला रु ने 15% अतिरिक्त घूस नई दिल्ली के ब्यापारियों को रिजर्व बैंक के कॉन्ट्रैक्ट को सुरक्षित करने के लिए दियारिपोर्ट यह भी थी कि डे ला रु ने रिजर्व बैंक सेटलमेंट के लिए चालीस मिलियन पाउंड का भुगतान कियाजो कि नोटो के पेपर के उत्पादन के लिए हुआ था
ये सब होने के बावजूदभी मंजूरी दी गयी है कि डे ला रु के साथ मिलकर मध्य प्रदेश में एक सिक्योरिटी पेपर मिलअनुसन्धान और विकास केंद्र की स्थापना की जाएगी|डे ला रु के नये सीईओ मार्टिन सदरलैंड ने इंडिया इन्वेस्टमेंट जर्नल के एक साक्षात्कार में कहा कि नकली नोटों के विषय पर यूनाइटेड किंगडम और भारत के बीच नवम्बर 2015 में हुए रक्षा एवं अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग भागीदारी समझौते’, के तहत डे ला रु दोनों देशों का जालसाजी के विषय पर समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है|हालाँकि डे ला रु पर से प्रतिबन्ध हटाने और कालीसूची से नाम हटाने के सम्बन्ध में कोई आधिकारिक घोषणा (समाचार रिपोर्ट के अलावा) नहीं की गयी हैडे ला रु जो कि रिजर्व बैंक का ठेका खोने के बाद लगभग दीवालिया हो गया थामहीने में इसके शेयर में 33.33 % भारी वृद्धि की सूचना है|प्रश्न जिसका अभी भी उत्तर दिया जाना बहुत ही जरूरी है वह ये कि क्या नये भारतीय मुद्रा की छपाई में कालीसूची में डाले गए क्राउन एजेंट कंपनियों की भागीदारी हैजिसने भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर पाकिस्तान के लिए नकली नोटों के सोर्स और सप्लाई की?

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