Tuesday, November 22, 2016

आतंक की चपेट में आती दुनिया

अखिलेश अखिल 
जहां विकास की बात होगी वही  विध्वंस भी होगा। अमीरी के साथ गरीबी और दोस्ती की जगह दुश्मनी चलती रहती है।  हो सकता है ये प्राकृतिक नियम ही हो।  लेकिन माना जाता है कि कोई भी समाज या देश बेहतर और शान्ति की राह पर ही चले। मानवता तो यही कहती है। लेकिन कहने भर से काम नहीं चलता। बदलती राजनीति , दुनिया की बढ़ती आबादी ,भू राजनीति से लेकर कही विकास तो कही गरीबी की प्रेत छाया संसार को अस्त व्यस्त किये हुए  है।  अमीरी पर गरीबी भारी है। शान्ति की जगह अशांति का बोलबाला ज्यादा है। दोस्ती की जगह दुश्मनी ज्यादा दिखती है। पूरी दुनिया हँस भी रही है और उसकी रुदन की आवाज भी सबको सुनाई पड़  रही है। ये तमाम बाते इसलिए की जा रही है कि  पिछले वर्ष दुनिया में 2014 की तुलना में आतंकवाद की घटनाओं में दस फीसदी कमी आई। 2001 के बाद यह सबसे बड़ी वार्षिक गिरावट है। अंतरराष्ट्रीय संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पीस के 'सालाना आतंकवाद सूचकांक" रिपोर्ट में यह एक राहत की खबर है। मगर इससे सामने आए बाकी तथ्य चिंता बढ़ाने वाले हैं। मसलन, यह कि आतंक का शिकार बने देशों की संख्या खासी बढ़ी। विकसित देशों के समूह आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के सदस्य मुल्कों में आतंकवादी हमलों में साढ़े छह गुना वृद्धि हुई। ये वो देश हैं, जिनकी सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद समझी जाती थी। ऐसे में ज्यादा आबादी और हिफाजत के कम चुस्त इंतजाम वाले देश किस खतरे में जी रहे हैं, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
वैसे आतंकी घटनाओं में गिरावट इसलिए आई, क्योंकि इराक में इस्लामिक स्टेट आईएस और नाईजीरिया में बोको हराम के खिलाफ सैनिक कार्रवाइयों को कामयाबी मिली। मगर इसी दौरान बाकी दुनिया में आईएस की हिंसा इतनी बढ़ी कि वह बोको हराम को पीछे छोड़ते हुए घोषित तौर पर सबसे खतरनाक संगठन बन गया। 2015 में 250 से अधिक शहरों में उसने हमले करने के दावे किए। इनमें 6,141 लोगों की जान गई। इस रिपोर्ट में अभी दुनिया में सक्रिय 274 दहशतगर्द संगठनों का जिक्र है, लेकिन तीन चौथाई आतंकवादी घटनाओं को अंजाम आईएस, बोको हराम, अल-कायदा और तालिबान ने ही दिया। रिपोर्ट इस निष्कर्ष पर है कि जो देश विदेशी टकरावों में शामिल नहीं होते, जहां यातना या न्यायेतर हत्याएं जैसी घटनाएं कम होती हैं और जिनकी स्थिति आर्थिक-सामाजिक संकेतकों पर बेहतर है, वो आतंकवाद के अपेक्षाकृत कम शिकार होते हैं। लेकिन क्या ये निष्कर्ष उन स्थितियों में भी टिकेंगे, जब कोई देश सीमापार से प्रायोजित आतंकवाद का निशाना बनता हो?
भारत के साथ यही स्थिति है। भारत ज्यादातर पाकिस्तान में संरक्षण व सहायता पाने वाले दहशतगर्द गिरोहों का निशाना बनता रहा है। ताजा रिपोर्ट कहती है कि 2015 में भारत में हुए आतंकी हमलों में 2014 की तुलना में कम मौतें हुईं, लेकिन देश इस्लामिक व माओवादी गुटों की हिंसा का शिकार बना रहा। पड़ोस में बांग्लादेश में आतंकियों ने अपने पैर और पसारे। भारत के लिए यह भी चिंता का पहलू है।
कुल मिलाकर ताजा रिपोर्ट का महत्व यह है कि इससे आतंकवाद के वैश्विक स्वरूप को समझने में मदद मिलती है। मगर इसकी कमी यह है कि इसमें सीमापार से प्रायोजित आतंकवाद पर अलग से अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। ना ही प्रायोजक देशों पर कार्रवाई और आतंकवाद विरोधी वैश्विक संधि जैसी बातों पर उचित जोर इसमें है। इसीलिए आतंकवाद से लड़ाई के संदर्भ में ये रिपोर्ट अधिक प्रासंगिक नहीं होगी। जबकि आज सबसे बड़ा प्रश्न आतंकवाद से निपटने के संकल्प और उपायों का ही है। 
       गौर करने की बात है कि आतंकवाद आज पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ी बाधा है।  मानवता के लिए कलंक और विकास के राह में रुकावट।  अक्सर देखा गया है कि  अक्सर लाभ के लिए कोई  देश  अपने  दुश्मन देश के विरोध में आतंकवाद का सृजन करता है लेकिन कुछ दिनों बाद वही आतंकबाद सृजनकर्ता देश के लिए ही भष्मासुर सावित होने लगता है।  इसलिए सबसे जरुरी है कि चाहे जो भी हो जाए आतंकवाद को कुचल दिया जाय।  भारत के लिए आतंकवाद आज सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।  पडोसी देशो की आतंक पर आधारित राजनीति न उसे पनपने दे रही है ना हमें।  

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