Tuesday, November 22, 2016

आप कुछ भी कर लीजिये ,हम नहीं बदलेंगे !

अखिलेश अखिल 
 हमारे देश में बजट किसके लिए बनता है ? योजनाए किसके लिए बनती है ? विकास किसका होता है या किसका हुआ है ? मंत्री संतरी किससे मिलते है और किससे मिलना पसंद करते है ? काम किसका होता है ? लाभ किसे  मिलता है ? नौकरशाहों के पास कौन पहुचता है ? क्या जनता के प्रतिनिधि  वाले नेता लोग जनता मिलते है ? जनता का कोई काम वे करते है ? नेता जी के लिए चुनावी फंड कौन देता है ? नेता जी को वोट जनता देती है और कालाधन वाले व्यापारी या लुटेरा समाज नेता जी को वोट और नोट दोनों देता  है।   नोट के सामने वोट की क्या बिसात ? वोट से नोट नहीं मिलेगा लेकिन नोट से वोट और अमीरी चमकती है।  इस कलयुग में नोट ही महान है।   बाकी सब बेकार।  इसलिए याद रखिये नोटबंदी के नाम पर जो भी खेल हो रहा है उसका असर बहुत ज्यादा नहीं होने वाला।  इस देश का आदमी तो भावुक होता है।  भावना में बहाकर उसे चाहे जितना ठग लीजिये , आँख दिखाकर उससे एक पैसा भी नहीं ले सकते।  तो कहानी ये है कि आम जनता को जो मन में आये करिये और देशभक्ति की गीत गाते रहिये --- राम राज्य आएगा , सबका कल्याण होगा।  समाजवाद आएगा , शोषण मुक्त देश बनेगा , सबका कल्याण होगा।    सरकार भी तो  है , पहले वाली सरकार भी आपके लिए ही काम करती थी , आज की सरकार भी वही कर रही है।  विकास के नारे तब भी लगे थे , आज भी लग रहे है।  पहले केवल विकास की बात थी ,आज विकास के साथ ही भक्ति , देश भक्ति , राष्ट्रभक्ति।  जो भक्त नहीं वह राष्ट्रवादी नहीं।  ३० फीसदी की भक्ति के सारा देश गुंजायमान है।  लेकिन सच यही है कि नेता लोग किसी के नहीं होते।  आम जन के  तो हरगिज नहीं।  आप से उनकी जरुरत केवल वोट लेने तक की है।  बाकी उनका काम उन्ही लोगो के लिए होता है जो उनको नोट और वोट का जुगार करे।  
       नोटबंदी मामले में भी वही कुछ है।  मोदी सरकार की इस योजना की चाहे जितनी सराहना की जाए काम ही है।  साहस वाला काम है  मोदी जी का।  लेकिन बेईमान देश में कभी ईमानदार प्रयास सफल नहीं होते।  इसलिए आप का परम काम यही है कि  की आप लाइन में लागिये और भारत माता की जैकारे लगाते हुए अपना पैसा लीजिये और चलते बनिए।  देश चलता रहेगा।  इसलिए गरीब, मध्य वर्ग या ईमानदार लाइन में लग कर अपना पचास, साठ, सौ प्रतिशत पैसा कनवर्ट करवा रहा है। उसका पैसा पहले भी सफेद था, नोट बदलते वक्त भी सफेद रहेगा और उससे काले धन की समस्या से देश की मुक्ती नहीं है। मुक्ति तब है जब अमीर लॉकर में रखे प्रोपर्टी के कागज, अपना सोना-चांदी-डायमंड व विदेशी बैंकों में जमा विदेशी करेंसी को लाकर बैंक में जमा कराएं। उसकी घोषणा करें। अभी इनके पास जो पांच प्रतिशत नकद होगा वह भी बैंक नहीं पहुंचेगा बल्कि एजेंटों, सीए के जरिए नई व्यवस्था में मैंनेज हो जाएगा। इसमें रियलिटी की यह बात जरूर बनती है कि थोक व्यापारियों, आड़तियों, सर्विसेस देने वालों के पास बहुत नकदी भरी होगी पर यह इसलिए स्वभाविक है क्योंकि ऑनलाइन और कार्ड याकि प्लास्टीक मनी की चाहे जितनी दिल्ली में बैठ कर बात की जाए, असली भारत में आज भी 80 प्रतिशत लेन-देन नकदी में होता है। व्यापारी ही एक ऐसा वर्ग है जों टैक्स बचाने, नकद लेन देन की आदत से नकदी रखता है। और वह एकाउंटिंग का भी मास्टर है और सीए के जरिए इनकम टैक्स विभाग को हैंडल करने में गुरू है। जब ऐसा है तो इनकी नकदी यानी  कथित ब्लेक मनी गंगा में वैसे नहीं बह रही है जैसे एक टीवी फुटैज से देश गुमराह हुआ कि काला धन पानी में बह रहा है। फिलहाल मुद्दे की बात है कि 500-1000 रु का नोट खत्म कर और उसे नए नोट में कनवर्ट करने की लाइन से जो पैसा बैंक में जा रहा है वह देश का काला धन मुक्त होना नहीं है। कालाधन तो चांदी-हीरे-जेवहरात में है। रियल एस्टेट में इनवेस्ट हुआ पड़ा है। हां, यदि नकदी को नियंत्रित करना पहला कदम है और उसके बाद घरों में रखे सोने–चांदी की घोषणा कराने, उसका सोर्स पूछने को नरेंद्र मोदी अनिवार्य बनवाते हैं। बैंको के लॉकरों को खुलवाते हैं। रियल एस्टेट में नेताओं- अफसरों के बेनामी निवेश, फ्लैट्स, जमीन-जायदाद को जप्त करने का मुहिम चलाते हैं तब तो आर्थिकी के देशी काले धन के सफेद होने का सिलसिला बनेगा। और यदि यह नहीं है और सिर्फ बैंकों में नकदी डलवानी है तो उलटे भ्रष्टाचार और बढ़ेगा। पिछले छह दिनों में व्यापारियों, कोलकत्ता, सूरत, मुंबई से ले कर दिल्ली की जो खबरें है उसका निचोड़ है कि करेंसी बदलने का दो नंबर का नया काला धंधा खुल गया है। इसमें व्यापारी, काले कारोबारियों की चांदी ही चांदी है। मोबाईल यूजर के आईडी खरीदने–बेचने जैसे नए धंधे के बाते होने लगी है ताकि उन आईडी पर बैंकों से पैसे निकले और सब तरफ से कमीशन बने।
 देश की जनता ने देश के लिए हमेशा कुर्बानी दी है।  आजादी से लेकर १९४८, १९६२ , १९७१ , १९९९ से लेकर आज तक।  कुर्बानी तो हमारे खून में है।  हम तो उसी के लिए बने है।  अपनी माँ का कष्ट किसी को याद है ? लेकिन माँ की कुर्बानी को जब बेटा याद नहीं रखता तो भला दोहरे वाले नेता आपकी कुर्बानी क्यों याद राख्नर लगे।  देश आपका , सम्पाती आपकी , राष्ट्र आपका लेकिन फैसला आपका नहीं।  लोकतंत्र के नाम पर ड्रामा।  जनता के नाम पर खेल।  एक धंधा के नाम पर दुसरा धंधा।  कही धन की लूट तो कही भावना और जज्बात की लूट।  राष्ट्रवाद के नाम देश की आत्मा की लूट।   याद रखिये सरकार की मंशा कालाधन रोकने की है लेकिन चालाक  लोगो के  लिए सरकार नाम की  नहीं होती।  माया के सामने सब ढेर।  सरकार भी ढेर और नेता भी ढेर।  जनता तो आप पहले से ही ढेर हो। ऐसी दस तरह की बाते आने वाले दिनों में होगी जिसमें लाइन में लगा गरीब चौतरफा मरेगा और वे व्यापारी, वे लोग फलेगे-फूलेंगे जिसे  खत्म करने के लिए इस दलील के साथ कुरबानी मांगी जा रही है कि सैनिक सीमा पर गोली  खाने के लिए खड़ा है और आप देश के खातिर कुछ घंटे लाइन में खड़े नहीं रह सकते। इसलिए आप लाइन में लगे रहिये।  लाइन से हटे  कि देश बर्बाद।  

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