Wednesday, December 14, 2016

उदारीकरण की लूट से बड़ी हो सकती है नोटबंदी की लूट


अखिलेश अखिल 
नोटबंदी का खेल ठीक उसी राह पर जा रहा है जैसा उदारीकरण का खेल हुआ था।  यह उदारीकरण की नीति ही थी जिसके भारी विरोध के बाद भी तत्कालीन नरसिंहा राव सरकार  उसे लागू करने पर अटल रही । जिस तरह नोटबंदी पर मोदी सरकार अटल है। उदारीकरण ने हमें गरीब से आमिर की श्रेणी में ला खड़ा किया।  यह उदारीकरण की नीति ही थी कि देश में विकास , नए नए करोड़पति और बड़े बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की रूप रेखा दिखाई पड़ने लगी।  जिसकी जहां तक पहुच थी , सबने उस बहती गंगा में डुबकी लगाईं।  जात -पात , अगड़े -पिछड़े  सबने उदारीकरण का लाभ उठाया।  देश की ४० फीसदी जनता को वैसे भी कभी कुछ नहीं मिलता इसलिए उदारीकरण के लूट से यह तपका उस दौर में भी बंचित ही रह गया। लेकिन बदले तो वे भी।  सभी दलो के लोगो ने उदारीकरण को खूब भोगा और जिया है।  जितने घोटाले ,  लूट और अपसंस्कृति  सालो में सामने आये है , कभी देखने को नहीं मिला।  विकास के साथ लूट और विनाश भी।  ठीक उसी तर्ज पर आज नोटबंदी की कहानी है।  बेहतर भविष्य की कामना को लेकर आयी नोटबंदी देश  भविष्य के लिए सार्थक कदम तो है।  लेकिन इसके पीछे भी लूट की संभावना दिख रही है।  इसमें कोई शक नहीं कि बगुला भगतो के इस देश में नोटबंदी की आड़ में देश और बर्बाद ही ना हो जाए।  देश का सबसे बड़ा घोटाला इस खेल के पीछे नजर आ रहा है।  
              महान वैज्ञानिक न्यूटन का तीसरा लॉ यही है की हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रया। अभी तक भौतिकी का यह सिद्धान्त अकाट्य है।  इस सिद्धान्त की कोई चुनौती नहीं। तो बात ये है कि अगर ये सिद्धान्त सत्य है तो इस सिद्धान्त के प्रयोग में असत्यता कैसे ?  वर्तमान मोदी सरकार ने देश में पनपे  कालाधन को समाप्त करने और अर्थव्यस्था को मजबूत बनाने के लिए नोटबंदी की नीति अपनाई और इस नीति को जनता के ऊपर डाल  दिया।  नीति बनाते समय मोदी के सलाहकारों ने जो अनुमान लगाया था कि महीने भर के भीतर देश का कालाधन निकल जाएगा , नकली नोट बर्बाद होगा और नए नोट  से भारतीय अर्थव्यवस्था को नयी गति मिलेगी।  अनुमान लगाया गया था कि अगर ५ से १० फीसदी कालाधन रुक भी जाता है तो किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए उसे स्वीकार कर लिया जाएगा।  नोटबंदी की नीति इसी आधार पर शुरू की गयी थी।  इस नीति के पीछे जनता की संभावित मुसीबते भी  सामने थी लेकिन सरकार को यह उम्मीद थी कि थोड़े समय में सब ठीक हो जाएगा और देश कालाधन मुक्त होगा।  काली कमाई निकलने के बाद सब कुछ सफ़ेद हो जाएगा और भारत दुनिया के तेजी से बढ़ने वाले विकासशील देशो की श्रेणी में आ खड़ा होगा।  नीति के मुताविक यह तय किया गया था की देश के भीतर ही इतनी आमदनी होगी , टैक्स बढ़ेगा की देश को बहुत काम कर्ज लेकर भी विकास की नीति को अंजाम देने में कोई तकलीफ नहीं होगी। 
          लेकिन ऐसा हुआ नहीं।  मोदी की नीति को पलीता लग गया।  जिस बैंक , बैंक नीति , बैंक कर्मचारी चाहे वह सरकारी , निजी बैंक हो या फिर भारत सरकार का रिज़र्व बैंक ही क्यों नहीं सबने मिलकर आजाद भारत का सबसे बड़ा खेल किया।  कह सकते है कि बैंकिंग नियम की आड़ में या फिर मोदी की नोटबंदी नीति के छिद्र का लाभ उठाकर बैंको ने देश के इस ऐतिहासिक विमुद्रीकरण की नीति को चौपट कर दिया है।  अब तक देश के विभिन्न इलाको से अरबो रुपये के पकडे गए कालेधन , सोना और अन्य महँगी सामानों की सूचि बनायी जाए तो साफ़ हो जाता है कि नोटबंदी की आड़ में देश के बैंको ने भारी काली कमाई को या तो छुपाने का काम किया या फिर घुस लेकर लालाओं के कालेधन की रक्षा की है।  ऐसी लूट आज से पहले कभी नहीं देखी  गयी थी। 
       याद कीजिये नोटबंदी की घोषणा के पहले पखवारे की। तब सरकार ने नीति बनायी थी कि उसमे कहा गया था कि जिन लोगोके पास पुराने 500 और 1000 के नोट है वे बैंक में अपना कोई आइडेंटिटी कार्ड लेकर उसे नए नोट से बदल ले।  यानी बैंक से अदला बदली करने के लिए कोई आइडेंटिटी कार्ड होना जरुरी था।  लेकिन ऐसे पहचान पत्रो की कोई मोनेटरिंग करने का इंतजाम नहीं किया गया।  यानी उन पहचान पत्रो का कोई  ऑनलाइन नहीं किया गया।  नोटबंदी की नीति में पहला छिद्र यही पाया गया।  तत्काल बैंक और उनके कर्मचारियों  छिद्र का बेजा लाभ उठाना शुरू किया और कालाधन बनाने और कालाधन छुपाने का नया नायब खेल शुरू कर दिया। 
        इसे एक उदहारण के जरिये समझा जा सकता है। मान लीजिये की किसी बैंक में हर रोज १००० आदमी अपना पहचान पत्र लेकर नोट बदलने के लिए किसी बैंक में गया। ग्राहकों ने अपने पहचान पत्र की फोटो  कॉपी जमा की और पुराने नोट को भुना लिया। फिर वही आदमी दूसरे , तीसरे , चौथे और ना जाने कितने बैंक में जाकर पहचान पत्र दिखाकर नॉट भुनाता रहा।  बैंक में आये अधिकतर नए नोट फिर किसी बड़े लोगो के पास जाता रहा।  चुकी पहचान पत्र का कोई रिकॉर्ड नहीं था इसलिए एक बैंक के मैनेजर दूसरे बैंक मैनेजर के साथ ग्राहकों के जमा पहचान पत्रो की अदला बदली करने का खेल शुरू कर दिया।  मान लीजिये किसी ग्राहक ने 500 पुराने नोट के बदले नए नोट बदलने की पर्ची भरी।  उस पर्ची को बाद में रद्द करके और शैडो पर्ची बनाकर मालदार लालाओं के भारी नोट को बदला गया। ये सारा खेल घुस और कमीशन पर चलता रहा।  लगभग १५ दिनों तक ऐसा खेल चलता रहा जब तक की पहचान पत्रो को ऑनलाइन नहीं किया गया।  इसी दौर में अधिकतर कालाधन को बैंक कर्मियों ने घुस के   जरिये छुपाने का काम किया।  यही वह दौर था की बैंक कर्मियों की मिलीभगत से अधिकतर नए नोट समाज के उन्ही कालाधन धारियो के पास चला गया।  वही नोट आज पकडे जा रहे है।  
         इस खेल में लगभग देश के सभी बैंक और बैंक कर्मी शामिल रहे है।  यह आजाद भारत का सबसे संगठित लूट कहा जा सकता है।  बैंको के जरिये इस लूट की दास्ताँ जब मोदी और उनके सिपहसालारों तक पहुची तब तक काफी देर हो चुकी थी। बाद  में मोदी सरकार ने बैंक के भीतर अपने जासूस तैनात किये।  कई बैंको में स्टिंग का खेल किया गया।  कहा जा रहा है की देश के विभिन्न बैंको के भीतर  की जालसाजी  के कोई 400 से ज्यादा सीडी वित्त मंत्रालय पहुच चुके है।  अब उस  सीडी की  कब जांच होगी और उसके क्या प्रतिफल सामने आएंगे इसे देखना होगा।  लेकिन एक बात तय है की इस नोटबंदी की आड़ में बैंक कर्मी , जांच एजेंसी भी मालामाल हुए और कालाधन भी बचा रहा गया।  
      अब थोड़ी नजर विपक्ष की राजनीति की तरफ फेरे तो साफ़ हो जाता है कि विपक्ष अगर यह कह रहा है कि नोटबंदी के जरिये सबसे बड़ा घोटाला किया गया है तो इसमें सच की  बू सामने आती है।  अगर केजरीवाल , राहुल गाँधी यह कह रहे है कि इस नोटबंदी में घोटाले हुए है तो इसकी संभावना से इनकार नहीं किये जा सकते।  अगर पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह यह कह रहे है कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था कमजोर होगी और कालाधन पर बहुत काम असर असर पडेगा तो इसकी संभावना को भी तलासने की जरुरत है। चुकी सरकार भी मान रही है कि बैंक के जरिये नोटबंदी की नीति को धरासाई करने का प्रयास किया गया है।  

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