Wednesday, December 14, 2016

और देश बदल रहा है ----


नोटबंदी को लेकर सबके अपने अपने तर्क  विराजमान है।  विरोद का स्वर अपना है और सरकार की बात अपनी है।  जनता भी दो फार में बट  गयी  है।  कुछ जनता भक्ति में लीन है  तो कुछ कालाधन से आजिज आकर नोटबंदी को सही मान रही है।  लेकिन इस नोटबंदी से  परेशानी सबकी है।  हर बार की तरह इस खेल में भी जनता अपनी आहुति दे रही है। भारत की अर्थव्यवस्था में 86 फ़ीसदी कैश हज़ार और पांच सौ के नोट के रूप में थे। नोटबंदी के फैसले का एक असर यह हुआ कि पेटीएम आदि जैसे माध्यमों से भुगतान का चलन बढ़ा है। मोबाइल से भुगतान करने के मामले में पेटीएम भारत की सबसे बड़ी कंपनी है। पेटीएम का कहना है कि उसके व्यवसायिक लेन-देन में सात सौ फ़ीसदी का इजाफा हुआ है और हर दिन होने वाला लेन-देन पचास लाख तक पहुंच चुका है।
पेटीएम का यह भी दावा है कि एप डाउनलोड करने वालों की संख्या में तीन सौ फ़ीसदी का इजाफा हुआ है। कुछ दिन पहले तक पेटीएम के जरिए 85,000 व्यापारी जुड़े हुए थे। कंपनी का लक्ष्य मार्च 2017 तक पचास लाख व्यापारी जोड़ने का है। पेटीएम का चीन की बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा के साथ एलायंस है। नोटबंदी की घोषणा के बाद से उसके व्यवसाय में बढ़ोत्तरी हुई है। अब यह कंपनी छोटे शहरों और कस्बों में अपने दफ़्तर खोल रही है ताकि अपना व्यवसाय और बढ़ा पाए। मोबीक्विक और फ्रीचार्ज जैसी मोबाइल सेवाओं के ग्राहकों में भी इजाफा हुआ है। लेकिन ये सिर्फ़ मोबाइल एप कंपनियां ही नहीं हैं जो ग्राहकों को लुभाने में लगे हुई हैं। बल्कि बड़े पैमाने पर भारतीय बैंक भी लोगों को कैश-लेस लेन-देन के लिए ऑनलाइन बैंकिंग और मोबाइल सेवाओं की मदद लेने को कह रहे हैं। स्मार्टफ़ोन के लिहाज से चीन के बाद भारत दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार है। इसके साथ ही इंटरनेट यूजर्स की संख्या में भी इजाफा हुआ है। फिलहाल देश में 40 करोड़ से भी ज़्यादा इंटरनेट यूजर्स हैं। उम्मीद है कि 2020 तक यह संख्या 70 करोड़ तक पहुंच जाएगी। इसके बावजूद अभी भी देश में ऑनलाइन और मोबाइल सेवा से खरीददारी करने वालों की संख्या देश की सवा अरब आबादी की तुलना में बहुत कम है। हकीकय यही है कि भारत को अभी कैश-लेस अर्थव्यवस्था बनने के लिए लंबा सफर तय करना है। ज्यादातर लोग यहां नकद में ही लेन-देन करना पसंद करते हैं। भारत की आधी से ज्यादा आबादी देहाती इलाकों में रहती है। इन इलाकों में मोबाइल कवरेज मिलना अभी भी एक मसला है और यह कैश-लेस इंडिया की चुनौती को और बढ़ाने वाला है। भारत में पिछले दो सालों के अंदर लाखों बैंक अकाउंट खोले गए हैं, लेकिन अभी भी लाखों लोग ऐसे है जिनके पास कोई खाता नहीं है। देश में अभी भी 65 करोड़ के पास डेबिट कार्ड है और ढाई करोड़ के पास क्रेडिट कार्ड है। डेबिट कार्ड की संख्या में तेज़ी से इजाफा हो रहा है, लेकिन ज्यादातर लोग इसका इस्तेमाल सिर्फ़ एटीएम से पैसे निकालने के लिए ही करते हैं। यानी वे इसका इस्तेमाल लेन-देन में भुगतान करने के लिए नहीं करते।
कस्बों और गांवों में अभी भी कैशलेस भुगतान को लेकर कोई ख़ास उत्साह नहीं देखने को मिल रहा है। अभी भी बहुत से भारतीयों के दिमाग़ में यह सोच बैठी हुई है कि इंटरनेट और मोबाइल से लेन-देन करना सुरक्षित नहीं है। एक ऐसे में कैश-लेस अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल करना आसान काम नहीं है। अब देखना है की आगे की राजनीति क्या होती है।  देश बदल रहा है।  मिजाज भी लोगो के बदल रहे है। कैशलेस इकॉनमी भारत कितना सह पाता है इसे परखने की बात है। 

No comments:

Post a Comment