Wednesday, December 14, 2016

नोटबंदी पर अब बदल रही राजनीति


नोटबंदी की राजनीति  समझ से परे  है।  सरकार नोटबंदी  को लेकर नयी व्यवस्था देने की वकालत कर रही है तो विपक्ष नोटबंदी को सबसे बड़ी  लूट करार दे रहा है। जनता क्या करे ? उसके मन में नोटबंदी के प्रति मोह भी है ताकि कालाधन ख़त्म हो और विपक्ष की राजनीति के साथ दिनोदिन पैसे की किल्लत नोटबंदी के प्रति उसमे आक्रोश भी पैदा कर रहा है। जनता को यह भी याद है कि जब १९९१ में उदारीकरण की नीति अपनाई जा रही थी तो सरकार के सारे तर्कों को विपक्ष बीजेपी गुलाम होगा भारत कह कर सरकार की नीतियों पर हमला कर रही थी।  तब स्वदेशी का नारा लगा था।  विदेशी सामानों  का बायकाट भी हुआ  था। करीब ५ वर्षो तक उदारीकरण की नीति , गेट , डब्लू टी ओ , डंकल की चर्चा चलती रही।  कांग्रेस की सरकार नहीं मानी और उदारीकरण की नीति लागू होती रही। बीजेपी के नेताओ ने तब यह भी कहा था की अगर उसकी सरकार बनेगी तो यह नीति बदल दी जायेगी।  लेकिन जब बाद में वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार  बनी तो उदारीकरण की नीति और तेज हो गयी।  सरकारी कंपनियां बेचीं जाने लगी।  बाजाब्ता सरकारी कंपनियों को बेचने के लिए एक मंत्रालय बना दिए गए।  कुछ इसी तरह की बात तब भी देखने को मिली जब राजीव गांधी कंप्यूटर लेकर भारत की तस्वीर बदलने आये थे।  चारो तरफ उस कंप्यूटर की घोर निंदा की गयी।  कहा गया कि अब लोगो को कोई रोजगार नहीं मिलेगा।  चारो तरफ छटनी होगी और बेकारी और बढ़ेगी।  बाद में कंप्यूटर ने देश और दुनिया की शक्ल ही बदल दी।  भारत में इस कंप्यूटर ने भारी रोजगार पैदा किये।  लेकिन नोटबंदी पर क्या कहा जाय ? 
       केंद्र सरकार अब काले धन की बात नहीं कर रही है। जब से पांच सौ और एक हजार रुपए के सारे नोट बैंकों में पहुंचने का अनुमान लगाया जाने लगा है, तब से सरकार के सुर बदल गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ साथ भाजपा के सारे नेता और मंत्री डिजिटल इकोनॉमी की बात करने लगे हैं। सारे मंत्रालय और बैंक कैशलेस इकोनॉमी के प्रचार में जुटे हैं। तभी विपक्षी पार्टियों के हमले का फोकस भी बदल गया है। नोटबंदी से होने वाली परेशानी का मुद्दा उठा रही विपक्षी पार्टियां अब डिजिटल इकोनॉमी लागू करने के केंद्र सरकार के प्रयासों की आलोचना करने लगी हैं। इसके लिए भी सीधे प्रधानमंत्री निशाने पर हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि डिजिटल इकोनॉमी की बात से सिर्फ गिनी चुनी कंपनियों को फायदा होगा, जिनमें से ज्यादातर विदेशी हैं। उन्होंने चीन की कंपनी अलीबाबा की फंडिंग से चल रही कंपनी पेटीएम को निशाना बनाते हुए कहा कि इसका मतलब है पे टू मोदी। इस बारे में विस्तार से बताने के लिए जब कहा गया तो उन्होंने कहा कि संसद में मौका मिलेगा तो विस्तार से बताएंगे। गौरतलब है कि डिजिटल लेनदेन के प्रचार में सबसे ज्यादा प्रचार पेटीएम को हुआ है।
उन्हीं की तर्ज पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मोदी को निशाना बनाते हुए कहा कि ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री प्लास्टिक मनी के ब्रांड एंबेसडर बन गए हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने भी इस अभियान को निशाना बनाया है और कहा कि भारत में सिर्फ 20 फीसदी लोग इस तरह की व्यवस्था से लेनदेन या खरीद फरोख्त करते हैं। उन्होंने भी इस प्रचार की मंशा पर सवाल उठाया है। वामपंथी पार्टियों तो पहले दिन से इस अभियान का विरोध कर ही रही हैं। कहा जा सकता है कि अब नोटबंदी के विरोध से फोकस हट कर डिजिटल लेनदेन के विरोध पर आ गया है।  साफ़ है कि नोटबंदी से अभी जो भी परेशानी हो रही है आने वाले समय में इसका लाभ होगा ही। यह बात और है कि इस नोटबंदी से आने वाली परेशानी को रोकने के लिए सरकार के तरफ से तैयारी ठीक से नहीं की गयी। विपक्ष का आरोप अपनी जगह ठीक और जायज है।  इतना बड़ा फैसला विपक्ष को साथ लेकर लेने की जरुरत थी।  लेकिन अब तो यह नीति पीछे हटने वाली नहीं है।  देश के भीतर चाहे जो भी तकलीफ आ जाए नोटबंदी की नीति अब राजनीति पर जा टिकी  है।  और राजनीति ही तो सबकुछ है। 

No comments:

Post a Comment