Wednesday, December 14, 2016

आर्थिक भ्रष्टाचार से ज्यादा नैतिक भ्रष्टाचार पर चोट की जरुरत


अखिलेश अखिल 
प्रधानमन्त्री मोदी की नोटबंदी आजाद भारत की कुछ महत्वपूर्ण योजनाओ में से एक है।  इसकी जितनी सराहना की जाय कम ही है। लेकिन नोटबंदी के नाम पर जो तरह तरह के खेल चल रहे है , जिसकी संभावना भी थी ,वह देश और जनता के लिए परेशान करने वाला है।  इसमें कोई शक नहीं कि  नोटबंदी से कुछ कालाधंधारीयो की तिजोरी कमजोर होगी लेकिन वर्तमान में लोगो को जो परेशानी हो रही है उसका जबाब भला कौन देगा ? जो सफ़ेद और  स्याह का खेल हो गया है ,जिसमे पूरा तंत्र शामिल है ,उसका क्या होगा।  दरअसल भ्रष्टाचार आर्थिक ,नैतिक  दोनों स्तर पर होते है।  आर्थिक भ्रष्टाचार को तो कमोबेस काबू में लाया जा सकता है लेकिन नैतिक भ्रष्टाचार को कोई कैसे कण्ट्रोल करे ?  देश के हर क्षेत्र में नैतिक पतन अपने पुरे शबाब पर है।  कौन नैतिक है और कौन अनैतिक इसका ब्यौरा किसके पास है ? कौन फैसला करे ? हम सब भगवान् को पूजते है।  याद करते है।  मनन करते है।  धार्मिक किताबो को पढ़ते है और अपने आराध्य को जपते है।  सारे धार्मिक किताबो में एक ही बात कही गयी है कि सादगी जीवन , परोपकार ,एवं झूठ ,लूट , घूसखोरी , जमाखोरी ,बलात्कार , पर स्त्री गमन आदि आदि पाप है।  अनैतिक है।  लेकिन हम कहा मानते। हम पूजा इसलिए करते है कि  आज कल से दुगुनी कमाई हो जाए।  जिसे समाज अनैतिक काम मानता है उससे जुड़े लोग भी पूजा करते है कि आज कुछ बेहतर काम बन जाए।  चोर , डकैत , लुटेरा , भ्रष्टाचारी , बलात्कारी , ठग और दलाल ये सब हमारे ही समाज के अंग है।  लेकिन कोई अपने इस पेशे को उजागर नहीं करता। फिर भ्रष्टाचार को कम कैसे किया जाए ? जब समाज का नैतिक पतन हो जाए तो तमाम तरह की बाते उलझन पैदा करती है।  हर आदमी एक दूसरे को शक की निगाह से देखता है।  हर काम में राजनीति दिखती है और ऐसा होता भी है। 
        ये बाते इसलिए कही जा रही है कि मोदी जी समाज से भ्रष्टाचार मिटाने चले है।  मिटाना भी चाहिए।  लेकिन सबसे पहले नैतिक भ्रष्टाचार को मिटाना जरुरी है।  यही भ्रष्टाचार समाज को गर्त की तरफ ले जाता है।  खासकर राजनीति में तो और भी।  अनैतिक आदमी कभी भी समाज सुधारक या फिर देश नायक नहीं बन सकता।  समाज को वही राह दिखा सकता है जो नैतिक हो और जिसके पास मूल्य हो।  इस देश में सबसे ज्यादा समाज , देश को किसी ने धोखा दिया है तो वह वर्ग है  राजनेता।  अधिकतर नेताओ पर कई तरह के मुकदमे दर्ज है।  कुछ झूठे मुकदमे तो कुछ वास्तविक।  कुछ चारित्रिक मुकदमे तो कुछ मानसिक दोष से सम्बंधित मुक़दमे।  आरोप और दोष में फर्क में फर्क हो सकते है लेकिन क्या नैतिक है क्या अनैतिक इसकी जानकारी समाज के पास होती है। कोई बलात्कारी , कोई खुनी , कोई लम्पट , कोई घूसखोर , कालाधन बनाने वाला अगर नेता ही हो जाए तो क्या उसके चरित्र बदल जाते है ? राजनीति में आने वाले अधिकतर लोग इसी कैटेगोरी के है।  लोग कहते है की जब जनता को ऐसे लोगो पर कोई ऐतराज नहीं है तब किसी को बोलने का क्या मतलब ? यही नैतिक पतन का गिर जाना।  हम सब गिरे हुए है।  अनैतिक है।  
        देश से जमींदारी ६० के दशक में ही समाप्त हो गयी।  कानूनन।  लेकिन जमींदारी आज भी चल रही है।  आगे भी चलेगी।  जब जमींदारों से उनकी जमीं छीनी जाने लगी तो लोग राजनीति में आने लगे।  अपनी ठाठ बनी रहे, चौधराहट कायम रहे इसलिए दिल्ली और देश के तमाम राज्यो में नेताओ ने बड़े बड़े मकान जिसे सांसद आवास या फिर विधायक आवास कहते है , की स्थापना की।  भारत के राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमन्त्री तक और मंत्री से लेकर सांसद -विधायक  तक के सरकारी आवासों को देख आइये तब पता चलेगा की इस देश में आज भी जमींदारी कैसे चल रही है।  जिस देश में करोडो लोगो को रहने के लिए घर नहीं है , करोडो लोग भूखे मर रहे है उस देश के नेता लोग औसतन १५ एकड़ के मकान में  रहते है।  संसद में गरीबी , भुखमरी से लेकर पक्ष विपक्ष के बीच तमाम अनर्गल मसलो पर चर्चा  तो होती है लेकिन चर्चा करने वाले अपने को नहीं देखते।  धोखा , जुमला , फरेब , पैसे , शराब , रोजगार , जाति , धर्म,  डर - भय ,से लेकर हिन्दू मुसलमान तक की बाते जनता के सामने परोस कर चुनाव जित लिय्रे जाते है और फिर उनकी जमींदारी शुरू हो जाती है। भला देश कैसे बदले।   आप ही बताये जिन लोगो ने पिछली सरकारों में घोटाले किये और फिर चुनाव जीत  गए तो क्या उनका घोटाला वाला दोष ख़त्म हो गया ? जिसने किसी की हत्या की और चुनाव जीत  गए तो क्या उनकी नियत ठीक हो गयी।  इसलिए हम सब अनैतिक है।  आर्थिक भ्रष्टाचार से ज्यादा नैतिक भ्रष्टाचार पर चोट करने की जरुरत है।  लेकिन यह कठिन मार्ग है।  फिर ऊपर से कलयुग भी। यानी अनैतिक वातावरण।  घी खाकर गरीब और गरीबी पर भाषण इसी कलयुग में संभव है। 

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