Wednesday, December 14, 2016

टूट भी सकती है अम्मा की पार्टी अन्नाद्रमुक !



अखिलेश अखिल 
अम्मा नहीं रही।  अम्मा के नाम से तमिलनाडु की राजनीति और और वहा की जनता  पर अपनी छाप छोड़ने वाली के जयललिता का आज अंतिम संस्कार होते ही तमिलनाडु की फिजा में एक दूसरी तरह की राजनीति भी हिलोड़े मारने लगी है।  छह बार तमिलनाडु की सीएम रहीं जयललिता के निधन के बाद अहम सवाल ये है कि राज्य की सियासत क्या करवट लेगी? ओ. पन्नीरसेल्वम नए सीएम बन गए हैं, लेकिन माना जा रहा है कि 44 साल पुरानी अन्नाद्रमुक की कमान जयललिता की खास सलाहकार रहीं शशिकला के ही हाथों में होगी। दरअसल, जयललिता के रहते पूरी राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द सिमटी रही। जयललिता ने पार्टी में कभी दूसरी पंक्ति के नेताओ को खड़ा ही नहीं किया।  खुद जयललिता ने भी इसके लिए खास कोशिश नहीं की। अब पार्टी टूटने का डर है। यह बात और है कि शशिकला और पन्नीरसेल्वम के बीच राजनितिक रिस्ते काफी मजबूत बताये जा रहे है लेकिन  बर्चस्व की लड़ाई की संभावना भी कोई काम नहीं।  यह बात और है की अभी फौरी तौर पर पन्नीर को सीएम बना दिया गया है लेकिन शशिकला के भीतर की राजनितिक इक्षा को भला कौन दबा सकता है ? 
       ऐसे में पहला सवाल तो यही है कि पन्नीर सीएम हो गए तो पार्टी का कमान किसके हाथ होगा ? अभी इस पद के प्रमुख दावेदारो में शशिकला का नाम सबसे आगे माना जा रहा है। जया के रहते सरकार और पार्टी पर सबसे ज्यादा पकड़ शशिकला की ही रही है।  यह बात और है कि  पन्नीर और शशिकला के बीच अभी किसी तरह के विवाद नहीं है लेकिन पन्नीर को लेकर पार्टी के कई विधायक असमंजस में है।  दर्जन भर से ज्यादा विधायक पन्नीर को पसंद नहीं करते।  अभी सरकार का काल चार साल बचा है ऐसे में माना जा सकता है कि पन्नीर के विरोध में विधायक उठेंगे और बात शशिकला पर जाकर रुक जायेगी। यह भी दिलचस्प होगा की एमजीआर और जया के बाद पार्टी का बागडोर किसी तीसरे आदमी के पास जाना है।  यह तीसरा कौन ? एक तो स्वयं शशिकला है और दूसरे एम् थम्बीदुरई हो सकते है। 

  देश में चल रही राजनीति को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है ४४ साल पुरानी इस पार्टी में भी अब टूट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। शशिकला कभी एक्टिव पॉलिटिक्स में नहीं रहीं। उन्होंने जया के पीछे रहकर ही काम किया। एआईएडीएमके में दबदबे को लेकर पन्नीरसेल्वम के साथ उनके मतभेद भी पैदा हो सकते हैं। न तो शशिकला और न ही पन्नीरसेल्वर इतने काबिल हैं कि पार्टी को एकजुट रख सकें।  इसे देखना होगा।  आने वाले दिनों में कांग्रेस और बीजेपी की राजनितिक जमीन यहाँ तैयार हो सकती है।  बीजेपी और कांग्रेस की हालत यहाँ काफी कमजोर ही है लेकिन अब जया के निधन के बाद  अन्नाद्रमुक में सेंध लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। दोनों दल पार्टी में टूट की राजनीति से बाज नहीं आएंगे।  उधर द्रमुक नेता करूणानिधि अभी कुछ करने की हालत में नहीं दीखते।  खुद बूढ़े और बीमार है और घर के भीतर भी राजनीति कम नहीं है।  लेकिन द्रमुक पार्टी की नजर भी जया की पार्टी को तोड़ने पर लगेगी। 

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