Wednesday, December 14, 2016

नोटबंदी से खुदरा व्यापार पर ज्यादा असर


नोटबंदी का असर कैसा रहेगा इसे लेकर कयास जारी है। सबकी अपनी अपनी राय है।  अर्थशास्त्री भी इस मसले पर बटे हुए है।  राजनितिक खेल तो है ही।  इस देश में बिना राजनीति के कुछ नहीं होता।  लेकिन इन सबके बीच आरबीआई गवर्नर की नीति देखने वाली है।  उर्जित पटेल साफ़ कर चुके है कि इस नोटबंदी का असर पर रहा है और लोगो की परेशानी बढ़ रही है।  माना गया था कि नोटबंदी के बाद अपनी पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में भारतीय रिजर्व बैंक  ब्याज दरें गिराएगा। लेकिन आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने यह उम्मीद पूरी नहीं की। उन्होंने रेपो रेट (जिस दर पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को कर्ज देता है) को 6.25 प्रतिशत पर बनाए रखा। रिवर्स रेपो रेट (जिस दर पर आरबीआई अन्य बैंकों के जमा पर ब्याज देता है) 5.75 फीसदी पर कायम रखा गया। इस पर शेयर बाजारों में शुरुआती प्रतिक्रिया नकारात्मक रही। 
बहरहाल, मौद्रिक नीति की ताजा घोषणा में ब्याज का पहलू बहुत अहम नहीं था। इसलिए कि नोटबंदी के कारण उपभोक्ता मांग धराशायी हो गई है। इन हालात में ब्याज सस्ता होने पर भी निवेशक कर्ज लेकर नए निवेश के लिए उत्साहित होते, इसकी संभावना कम है। इसीलिए ज्यादा ध्यान इस पर था कि उर्जित पटेल सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर और देश की आम वित्तीय हालत के बारे में कैसे अनुमान जताते हैं। इस बारे में पटेल की टिप्पणियों से आश्वस्त करने वाली सूरत नहीं उभरी। उन्होंने कहा कि नोटबंदी का असर अल्पकालिक रहा, तो विकास दर दोबारा तेजी पकड़ेगी। फिलहाल उन्होंने 2016-17 में जीडीपी की अनुमानित वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत से घटाकर 7.1 फीसदी कर दी। पटेल ने स्वीकार किया कि नोटबंदी के कारण खुदरा कारोबार, होटल-रेस्तरां और परिवहन आदि जैसे अधिक नकदी के इस्तेमाल वाले क्षेत्र छोटी अवधि में अवरुद्ध होंगे। 
इस तरह विभिन्न् अर्थशास्त्रियों द्वारा जताई गई ये आशंका पुष्ट हो गई है कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर खराब असर हो रहा है। चिंताजनक यह है कि ज्यादातर अर्थशास्त्रियों की राय में यह असर गहरा और दीर्घकालिक हो सकता है। पटेल ने नोटबंदी की वजह से महंगाई दर में गिरावट की संभावना जरूर बताई, लेकिन जब कारोबारी गतिविधियां सुस्त हों, बाजार में खरीद-बिक्री सीमित हो गई हो, तो मुद्रास्फीति का घटना उसका स्वाभाविक परिणाम होता है। आरबीआई ने नोटों की पर्याप्त आपूर्ति होने को लेकर आमजन को आश्वस्त करने की कोशिश भी की, परंतु उसकी इस बात पर लोगों को भरोसा तभी होगा जब उन्हें अपना पैसा लेने के लिए बैंकों व एटीएम के बाहर लंबी कतारों में खड़ा नहीं होना पड़ेगा। 
बाकी मुद्दे सियासी किस्म के हैं। मसलन, आरबीआई ने इन आरोपों का खंडन किया कि नोटबंदी का फैसला जल्दबाजी में लिया गया। ऐसे प्रश्न आमजन के लिए अहम नहीं। उनकी चिंता है कि नोटबंदी के कारण रोजमर्रा के जीवन में हो रही दिक्कतों से जल्द निजात मिले। यह कदम नेक उद्देश्य से उठाया गया, इसमें किसी को शक नहीं। इसीलिए तमाम कठिनाइयों के बीच लोगों का समर्थन सरकार के साथ बना हुआ है। बहरहाल, अब आरबीआई ने भी मान लिया है कि नोटबंदी से आर्थिक जीवन अवरुद्ध हुआ है। तो अब उससे व सरकार से अपेक्षा है कि इसे अल्पकालिक ही बनाए रखने के लिए वे भरसक प्रयास करते दिखें। देखने की बात होगी कि इस नोटबंदी का दीर्घकालिक असर ना रहे।  अगर ऐसा हुआ तो इसके व्यापक परिणाम भी आ सकते है। 

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