Wednesday, December 21, 2016

पहले सिस्टम करप्ट था अब करप्शन ही सिस्टम बन गया



अखिलेश अखिल
भ्रस्टाचार ही जब पूरा सिस्टम बन गया हो तो फिर ईमानदारी की बात बेमानी ही है। जब इंसान की रगो में बेमानी और लूट झूट के लहू बहने लगे तो सबसे पहले इंसानियत की मौत होती है और उसके बाद राष्ट्र नामक संस्था उसके लिए मात्र हाथी के दिखाने वाले दन्त के सामान ही होते है। हम गर्व से कह सकते है कि पहले हमारा सिस्टम करप्ट था। कुछ लोग , कुछ संस्था करप्ट होकर देश , समाज की तिजोरी में सेंध लगा रहे थे। लेकिन अब तो पूरा सिस्टम ही करप्ट हो गया है। जब पूरा सिस्टम ही करप्ट हो जाए तो ईमानदारी की बात बेमानी ही है। बाजार सब पर हावी है और बाजार के आगोश में आने के बाद ईमानदारी की बात बेकार की बाते है। हम भ्रष्ट सिस्टम पर और करेंगे लेकिन सबसे पहले मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी नमक का दरोगा पर एक नजर
नामक का दरोगा कहानी समाज की यथार्थ स्थिति को उदघाटित करती है। मुंशी वंशीधर एक ईमानदार और कर्तव्यपरायण व्यक्ति है ,जो समाज में ईमानदारी और कर्त्तव्य निष्ठा की मिशाल कायम करता है। पंडित अलोपीदीन दातागंज के सबसे अधिक अमीर और इज्जतदार व्यक्ति
थे! जिनकी राजनीति में भी अच्छी पकड़ थी! अधिकांश अधिकारी उनके अह्सान तले दबे हुए थे! अलोपीदीन ने धन के बल पर सभी वर्गों के व्यक्तियों को गुलाम बना रखा था! और वह पैसे कमाने के लिए नियमविरुद्ध कार्य करता है ! दरोगा मुंशी वंशीधर उसकी नमक की गाड़ियों को पकड़ लेता है, और अलोपीदीन को अदालत मैं गुनाहगार के रूप मैं प्रस्तुत करता है ! लेकिन बकील और प्रशाशनिक आधिकारी आदि ने उसे निर्दोष सावित कर दिया और वंशीधर को नौकरी से वेदखल कर दिया ! इसके उपरांत पंडित अलोपीदीन, वंशीधर के घर जाके माफी मांगता है और अपने कारोवार में स्थाई मनेजेर वना देता है तथा उसकी ईमानदारी और कर्त्तव्य निष्ठा के आगे नतमस्तक हो जाता है!
कहानी सम्राट मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी देश , समाज और भ्रष्ट व्यवस्था पर करारी चोट करती है तो यह भी मिशाल कायम करती है कि ईमानदारी भी कोई चीज है। आखिर में बेईमान को भी ईमानदारी के सामने झुकना ही पड़ता है। इस कहानी से यह भी सिख मिलती है कि हर बेईमान आदमी को अपनी बेईमान धन को छुपाने के लिए किसी ईमानदार की जरुरत होती है।
लेकिन अब ईमानदार कौन है ? लोक तंत्र के चारो स्तम्भ अर्ध नहीं पूरी तरह से भ्रष्टाचार का चक्करघिन्नी काट रहे है। कोई किसी से कम नहीं। और जनता ? उनकी तो बात ही मत पूछिये। यथा राजा तथा प्रजा की कहावत आज पूरी तरह हम सब पर लागू है। जब राजा और प्रजा दोनों ठगी की शक्ल में मैदान में हो तो मंजर क्या होगा आप खुद समझ सकते है। सरकार में शामिल अधिकतर नेता नुमा खिलाड़ी मूलतः चोर और हरामखोर ही तो है। डाका किसने नहीं डाला ? झूठ किसने नहीं बोला ? पैसा किसने नहीं कमाया ? आंकड़े तो बता रहे है की नेता बनते ही अधिकतर नेता की आय तेजी से आगे बढ़ जाती है। आंकड़े यह भी बता रहे है कि मंत्री बनते ही ७० फीसदी नेताओ की आय में १०० गुनी बढ़ोतरी हो जाती है। और राजनीति में ठगी कोई धन की करता है तो कोई झूठी बयानबाजी की ठगी से समाज को बौना बना देता है। जो पैसा नहीं कमाता वह धर्म ,जाति ,हिन्दू , मुसलमान की ऐसी राजनीति करता है की जनता कराह उठती है। नेता लोग कहते है कि पहले काम करो फिर दाम मिलेगा। काम ? वही जिससे वोट की राजनीति सफल हो। चाहे जो भी करना हो। नौकरशाह , किरानी , अधिकारी , पुलिस , पत्रकार , डॉक्टर , वकील और सबसे इतर व्यापारी। सबके सब देश को तबाह करने में ही जुटे है। कहते है कि नादिरशाह ने हमारे देश को बहुत ही लुटा। लेकिन आजाद भारत में जितनी संपत्ति की लूट हमारे नेताओ और नौकरशाहों व कॉर्पोरेट घरानों ने की उतनी लूट नादिरशाह ने भी नहीं की थी।

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