Sunday, February 12, 2017

चम्बल के डाकुओ को शर्मशार करती राजनीति


अखिलेश अखिल 

राजनितिक गिरोहबाजों के चंगुल में फसा लोकतंत्र सिसक रहा है। इस घुटन में आवाज नहीं केवल सिसकिया है।  जब बड़ा आघात इंसान को हैमर करता है तो उसमे केवल सिसकिया ही निकलती है।  जोर जोर से रुदाली नहीं होती।  जोर से रोने का अपना शास्त्र है और सिसकने का अपना शास्त्र।  सिसकन भरी रुदाली मर्माहित करती है।  किंकर्तयविमूढ़ करती है और दिल को तोड़ती है।  भारतीय लोकतंत्र का अभी यही मिजाज है।  राजनितिक बहेलियों ने हमें चारो तरफ से इस तरह घेर रखा है कि हम चाहकर भी कही आसरा नहीं ले सकते।  ना रो सकते है ना ही हस सकते है।  लोकतंत्र के नाम पर हमें वोट देने की जो आजादी दी गयी है अब उसमे कुछ भी रस नहीं।  ना कोई उल्लास ना ही कोई आनंद।  इस वीते देने की आजादी ने हमें हर एक से दुश्मन बना दिया है।  हम सबके राडार पर है।  धर्म का झंडा बुलंद करने वाले भी हमारी औकात को भाप कर जा रहे है और जाति का झंडा उठाने वाला भी हमें साम ,दाम ,दंड और भेद का पहाड़ा सुनाकर हमारा मान मर्दन करता जा रहा है। हम कही के नहीं।  हमारे लिए लोकतंत्र किसी शाप से काम नहीं। 
       गिरोहबाज राजनीति के चंगुल में सिसकते लोकतंत्र की कहानी आपके सामने है।  जिन जिन राज्यो में अभी चुनावी दुदुम्भी बज रही है और उसे भी सुनिये और उन गिरोहबाज  नेताओ ,उनके आकाओ और समर्थको के पैतरे को देखिये तो लगता है मानो जमीन पर स्वर्ग लाने को वे धरती पर साक्षात भगवान् का अवतार लेकर हमारे बीच पधार गए है।  तरह तरह के नारो के जरिये हमारा मनोरंजन करते ये गिरोहबाज से कौन पूछे कि पिछले चुनाव में जो नारा उन्होंने गढ़ा था उसका क्या हुआ ? तब के नारे आज बेकार क्यों हो गए ? तब की राजनीति खोटा क्यों हो गयी ? तब के वादे पुरे क्यों नहीं हुए ? यह सवाल तो सभी गिरोह के नेताओ के लिए है।  क्या कांग्रेस ,क्या भाजपा , क्या सपा ,क्या बसपा ,क्या रालोद और क्या और भी कोई गिरोह ? 
          जिनसे पूछो सब सरकार बनाने पर आमदा है।  सब हमें आमिर बनाने के सपने दिखा रहे है।  सब हमारी तक़दीर सुधारने के फेर में है।  लेकिन कोई इनसे नहीं पूछ रहा कि जब महंगाई की वजह से हम लाचार जनता की कमर टूट रही है तो ऐसे में तुम चुनाव लड़ने के लिए कौन सा जमीन जायदाद बेचकर चुनाव मैदान मैदान में शंखनाद कर रहे हो ? २०१४ के चुनाव में बीजेपी वालो ने भी हमसे बहुत कुछ वादा किया था।  कांग्रेस वालो ने भी किया था और अन्य गिरोहबाजों ने भी किया था।  सबको धूल चटाकर बीजेपी वालो ने सता हथिया ली।  उम्मीद बढ़ गयी थी।  सपने साकार होने की ख़ुशी जगी थी।  अभी तक कोई सपना पूरा नहीं हुआ।  बीजेपी वाले फिर यूपी में स्वर्ग लाने की कसमे जनता को दिला रहे है।  उनसे कौन पूछे कि जिन एक दर्जन से ज्यादा राज्यो में उनकी सरकार वर्षो से चल रही है ,क्या वहा के लोग स्वर्ग में जी रहे है ? क्या वहा कोई क्रीम नहीं होता ? क्या वहा के लोग भूखे नहीं है ? क्या वहा के लोग बेकार और बेरोजगार नहीं है ? क्या वहा साफ़ सफाई और सबके लिए सोने के सिंहासन लगा दिए है है ? क्या वहा पलायन नहीं है ? क्या वहा दलित उत्पीडन नहीं है ? क्या उन राज्यो में नक्सलवाद नहीं है ? क्या वहा घोटाले नहीं हो रहे है ? क्या का पूरा तंत्र घोटाले में पैबस्त नहीं है ? सवाल और भी है। 
       उन सपाइयों और बसपाइयों और कांग्रेसियो से भी तो पूछा जाना चाहिए कि तुम चोरी  नहीं ? तुम्हें डाका डाला या नहीं ? तुमने जातिवाद -धर्मवाद की राजनीति की या नहीं ? तुम घोटालेबाज हो या नहीं ? तुम्हें देश को लुटा या नहीं ? क्या तुमने जो वादे किये ,उसे पूरा किया क्या ? जबाब किसी के पास नहीं है। सबके सब थेथर और गिरहकट है।  मुर्ख लोग राजनीति ज्यादा करते है और पढेलिखे लोगो पर राज करते है।  जिसके पास डिग्री नहीं , जिसके पास नीति नहीं , जिसके पास कल्याणकारी सोच नहीं और जो किसी भी तरह लोकतंत्र को अपने पक्ष में करके सत्ता की कुर्सी पर बैठना चाहता है वैसे गिरोहबाजों से यह लोकतंत्र अब लहूलुहान हो गया है। 
       चम्बल घाटी  कभी डाकुओ की हुंकार से थर्राती थी।  एक से बढ़कर एक डाकू उसी चम्बल में भगवान् की तरह भी पूजे जाते थे।  उनकी आत्मा थी।  उनमे नीति थी , उनमे लोकाचार था।  उनमे बहु बेटियो के लिए करुणा थी।  लेकिन आज के राजनितिक गिरोहबाज चम्बल के डाकुओ को भी शर्मिन्दा करते दिख रहे है।  कह सकते है कि आज के नेताओ से कल के चम्बल के डाकू ज्यादा सच्चे और वादों पर खड़े उतरनेवाले थे।  

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