Friday, February 17, 2017

लुटेरी राजनीति से बुंदेलखंड की पुकार


अखिलेश अखिल 
भूख ,अकाल, शोषण और पलायन के लिए मजबूर उत्तरप्रदेश का बुन्देलखण्ड इलाका तरह तरह के नेताओ और उनके पैंतरे से अकबकाया हुया है।  लंबी लंबी और महंगी गाड़ियों में तरह तरह के झंडे ,बैनर बुन्देलखंडियो को खूब लुभा भी रहे है और उनकी आत्मा को कसमसा भी रहे है। लगभग कंगाल हो चुके बुंदेलखंड में खोजने से भी युवाओ के दर्शन नहीं होते।  सबके सब पलायन कर चुके है।  भात ,रोटी के जुगार में।  जान बचे तो लाखो उपाय।  चुनाव से पहले कुछ राजनितिक पार्टियों ने बुंदेलखंड के गाव  में अपने दलालो को भेजकर बहार चले गए युवा और युवतियों को वोट डालने के लिए किराया -भाड़ा देने की बाते की थी।  गाव में बचे -खुचे बुजुर्गो ने दलालो  चिरौरी पर अपने अपने लोगो को बुलाने की हामी भी भरी थी।  लेकिन दलाल पार्टी का पैसा खा गए।  नतीजा ये हुआ कि अधिकतर लोग बाहर से वोट डालने अभी तक नहीं आये है।  गाव के गाव  खाली पड़े है।  जिस गाव में आप जाएंगे ,केवल बूढ़े और बच्चे ही आपको मिलेंगे। 
       ७० साल की आजादी के बाद भी बुंदेलखंड नहीं बदला है।  सूखे मार यहाँ हर साल पड़ती है।  मजदूरी और किसानी ही बुंदेलखंड में जीवित रहने का सहारा है लेकिन पिछले कई साल से लगातार सूखे  समस्या ने बुंदेलखंड को कंगाल बना दिया है।  ना किसानी ना रोजगार।  सरकार की सभी योजनाए लूट की शिकार।  कहने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार हर साल बुन्देलखंड को ज़िंदा रखने के लिए कई तरह के ऐलान तो करती है लेकिन गरीब जनता   को कुछ नहीं मिलता।  जिन महाजनो के हाथ में पैसे जाते है वे गपक जाते है और बड़ी बड़ी गाड़ियों को खरीदकर अपने दरबाजे की शोभा बढ़ाते है। 
              देश और दुनिया में बुंदेलखंड की पहचान गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी बन गई है, इसे राजनीतिक दल और सरकारें भी स्वीकारती हैं, मगर यहां की सड़कों पर दौड़ती लग्जरी गाड़ियां बुंदेलखंड की गरीब छवि पर भारी पड़ती नजर आती हैं।बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के 13 जिलों में फैला हुआ है, उत्तर प्रदेश के हिस्से के बुंदेलखड में झांसी, ललितपुर, जालौन, बांदा, हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट आता है। यहां विधानसभा की कुल 19 सीटें हैं और मतदान 23 फरवरी हो होना है।
            चुनाव के बीच सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां एक बात का तो एहसास करा जाती हैं कि बुंदेलखंड की चर्चा भले गरीबी को लेकर होती हो, मगर यहां धन्ना सेठों की भी कमी नहीं है। एसयूवी सफारी, स्कार्पियो, फॉरच्यूनर, इंडीवर जैसी गाड़ी हर पल सामने से गुजरती नजर आ जाती है।
झांसी के वाहन विक्रेता  स्वीकारते हैं कि बुंदेलखंड ग्रामीण इलाका है, लिहाजा लोगों की पहली पसंद एसयूवी गाड़ियां हैं। वे बताते हैं कि उनके यहां से हर माह लगभग 15 सफारी और सात से आठ फॉरच्यूनर गाड़ियां बिक जाती हैं। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो एक बात साफ हो जाती है कि इस क्षेत्र में सफारी हर दूसरे रोज और फॉरच्यूनर हर चौथे रोज एक बिकती है। साल भर में डेढ़ सौ से ज्यादा सफारी व सौ के लगभग फॉरच्यूनर बिकती हैं। इसके अलावा अन्य गाड़ियों की बिक्री का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। असमानता की कहानी का सबसे बड़ा प्रतिक बन गया है बुंदेलखंड। 
         बुंदेलखंड सियासी खेल में पीस रहा है। कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है जिसने इस इलाके के वोटरों को नहीं ठगा हो।  दो महीने पहले तक इस इलाके में किसी भी नेता की पहुच नहीं थी।  आखिर भूखे ,प्यासे राजनीति करने जाए कौन ? चुनावी मौसम में बीजेपी वाले भी खूब लगे है।  कई तरह के वादे बीजेपी की तरफ से किये गए है।  सपा वाले हर बार बुंदेलखंड को खूब पानी देने की बाते कर रहे है।  चुनाव जिताओ तो पानी मिलेगा।  वोट नहीं तो पानी नहीं।  वादों का मतलब तो यही निकाला जा सकता है। बसपा वाले  नगारा पिट रहे है।  हमें जिताओ तो सबका कल्याण।  ठग राजनीति को देख सुन कर बुन्देलखण्डी समाज का मन टूटता दिख रहा है।
             २३ फरवरी को यूपी के चौथे चरण में बुंदेलखंड मतदान करेगा। जालौन, महोबा ,ललितपुर ,हमीरपुर, बांदा , झाँसी और चित्रकूट की १९ विधान सभा सीट पर लड़ाई है। त्रिकोणात्मक संघर्ष है। २०१२ के चुनाव में ४ सीट कांग्रेस ,१ बीजेपी और ७-७ सीट बसपा और सपा के हाथ लगी थी। वैसे यह इलाका बसपा का रहा है लेकिन सपा- कांग्रेस गठबंधन को इस बार इस इलाके से बड़ी उम्मीद है।  उसे 14 सीट मिलने की उम्मीद है। लेकिन बसपा का बामसेफ किसी भी सूरत में बुंदेलखंड को अपने कब्जे में जुटा है।  बसपा इस इलाके को अलग राज्य देने की वकालत भी करती रही है। लेकिन बीजेपी भी कोई कम  नहीं है।  वोट लेने के फेर में बीजेपी की नरेन्द्र मोदी सरकार ने रेल लाइन और केन बेतवा लिंक परियोजना के जरिये लोगो को लुभा रही है। 
   जातीय समीकरण यहाँ भी पुरे शबाब पर है।  जातो की गोलबंदी के बीच धार्मिक उन्माद भी कुछ कम नहीं।  एक तरफ जाति और धर्म का खेल और दूसरी तरफ भूख ,गरीबी और पलायन।  किसी भी पार्टी के मन में बुंदेलखंड के लिए ममता नहीं।  पहले  वोट दो फिर सेवा लो।  जब बुंदेलखंडी सवाल पूछते है कि पहले उसने वोट दिए थे और कुछ नहीं मिला तो उस पर वर्गीय राजनीति का आरोप लगाकर अलग कर दिया जाता है।  पता नहीं इस बार बुंदेलखंड में किसका डंका बजेगा ? लेकिन असली सवाल यही है कि क्या बुंदेलखंड की तस्वीर बदलेगी ? 

No comments:

Post a Comment