Saturday, February 25, 2017

त्रिशंकु विधान सभा की तरफ बढ़ती यूपी राजनीति



अखिलेश अखिल 

किसकी राजनीति कब  भारी पड़ जाय और किसकी सतरंजी चाल किसको मात दे यह भला कौन   बता सकता है ?  भारतीय राजनीति का मिजाज  ही कुछ ऐसा है कि हर चुनाव  में जनता राजनीति भी करती है और राजनीति को सबक भी सिखाती है।  पांच राज्यो  में हो रहे  चुनाव इस देश और यहाँ की तमाम बदनाम और गिरोहबाज पार्टियों के लिए  महत्वपूर्ण नहीं है जितना की यूपी  का चुनाव है।  यूपी चुनाव के परिणाम आने वाली राजनीति की दस्तक सावित होगी ऐसा  ही कुछ माना जा रहा है।  यूपी मोदी का हो ,या फिर अखिलेश -राहुल के गठबंधन का या फिर बहन मायावती के बसपा का ! सबकी अपनी राजनीति और सबके अनमोल पैंतरे।  यह यूपी की चुनावी राजनीति ही है जहां सबकी इज्जत तार -तार है।  यह यूपी ही है जहां चुनावी खेल में प्रधानमन्त्री जैसे पद की गरिमा  गयी है।  विपक्ष के चेहरे नंगे  हो गए है।  जाति -धर्म के इस नंगे नाच के बाद अगर किसी गिरोह को सत्ता की कुर्सी  मिल भी जायेगी तो उस लोकतंत्र   का क्या होगा जिसे सभी ने मिलकर बेशर्म कर दिया है। लेकिन जाने दीजिये  इन बातों को। अंतिम कहानी तो यही है कि यूपी के इस चुनाव में सत्ता की राजनीति किसके पक्ष में जायेगी ? दावे तो सभी दलों के है लेकिन हर दावे हर चुनाव में खारिज भी होते रहे है।  इसलिए दावो के बाद देश की जनता  चुनाव परिणाम आने के बाद हर राजनितिक दलों की रुदाली भी देखती है और सुनती है। 
      अभी हाल में सीएसडीएस  ने यूपी के चुनाव पर कुछ आंकड़े की बात सामने रखी है।  वे आंकड़े यूपी चुनाव में सभी राजनितिक दलों की जीत के लिए जरुरी है। याद कीजिये  2012 के यूपी चुनाव परिणाम को।  उस चुनाव में बीजेपी ने 403 में से 47 सीटों पर जीत हासिल कर यूपी विधानसभा चुनाव में तीसरा स्थान हासिल किया था।  दो साल बाद नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुए लोकसभा चुनावी खेल में बीजेपी ने 71 सीटें जीती  जो करीब 337 विधान सभा सीटों पर  जीत बतायी गयी। यह ऐतिहासिक जीत थी बीजेपी की। वहीं 2012 विधानसभा चुनाव में 226 सीट जीतने वाली समाजवादी पार्टी ने 2014 लोकसभा चुनाव में महज़ 42 विधान सभा सीटों पर ही कब्जा जमाया था। यूपी में जीत हासिल करने के लिए किसी भी पार्टी को  403 में से 202 सीट यानि 35 प्रतिशत वोट हासिल करने होंगे।  यह तो एक मोटामोटी गणित है।  अगर 2014 के लोकसभा चुनाव पर नजर डालें तो सपा ने 42 सीट जीत कर 30 प्रतिशत वोट पाए थे।  वहीं बीजेपी  337 सीट पाईं थी और 43 प्रतिशत वोट।  2012  के विधान सभा चुनाव में बीजेपी का  यह आंकड़ा मात्र 15 प्रतिशत था। अब असली   खेल यह है कि बीजेपी सत्ता में कैसे आये ? 2014  के मोदी लहर को बीजेपी कितना फैलाये ? अगर बीजेपी यूपी में 2014  वाला मोदी लहर बनाने में सफल हो जाती है तो उसकी सरकार आसानी से बन सकती है। और उस लहार को बांधे रखना बीजेपी की मज़बूरी है और चुनौती भी। लेकिन अभी ऐसा है नहीं। इस बार यूपी मोदी लहर से दूर है।  इसके कई कारण है जिनमे एक कारण केंद्र और राज्य की राजनीति का अंतर है।   
        बीजेपी के जो खांटी समर्थक हैं, उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव के वोट में 25 प्रतिशत योगदान दिया है।  जबकि  लोकसभा चुनाव में बीजेपी को  43 फीसदी  वोट मिल  गया। जाहिर है मोदी लहर से  लोक सभा चुनाव में कोई 18 फीसदी  वोट अलग से बीजेपी को मिल गए। बीजेपी को यूपी में चुनाव जितने के लिए  कम से कम 35 प्रतिशत की जरूरत है। मान भी लिया जाय कि बदली राजनीति में मोदी लहर के 18 फीसदी वोट में से 8 फीसदी वोट फिर से अपनी परंपरागत पार्टी को चले जाते है तो भी सरकार बनाने के लिए बीजेपी को बाकी 10  फीसदी वोट को बचाये रखना जरुरी होगा।  तभी बीजेपी के परम्परगत 25  फीसदी वोट और मोदी लहर के नाम पर बीजेपी से जुड़े 18 में से 10   फीसदी  वोट  यानी कुल; 35  फीसदी वोट की रक्षा करनी पड़ेगी। साफ़ शब्दो में कह सकते है कि बीजेपी को अपने परम्परगत  25  फीसदी वोट के साथ ही लहर वाले 18 फीसदी में से 8 फीसदी वोट गवांकर १० फीसदी वोट को बचाना होगा।  बीजेपी इसी खेल में लगी भी है।  वह किसी भी  तरह से  10 फीसदी वोट की ही लड़ाई लड़ रही है।  
      उधर , समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की राजनीति को देखा जाए तो साफ़ हो जाता है कि  दोनों पार्टी को 35 प्रतिशत वोट अपने परंपरागत वोटरों से मिलते रहे हैं। 2012  के विधान सभा चुनाव में दोनों दलों कुल 35 फीसदी वोट मिले थे। लेकिन  2014 में मोदी लहर ने इनके हिस्से को महज़ 30 प्रतिशत पर लाकर खड़ा कर दिया था।  इनके ५ फीसदी वोट मोदी लहर की भेट चढ़ गए थे। हर पार्टी को पता है कि चुनावी रेस में डटे रहने के लिए कम से कम 35  फीसदी वोट जरुरी है।  तो इस बार गठबंधन को जीतने के लिए उन 5 फीसदी वोटरों को वापस लाना होगा जो 2014 में बीजेपी के पास चले गए थे।  याद करा देना जरुरी है कि जो समूह 2014 में बीजेपी के पास चले गए थे उनमें ऊंची जाति और जाटव दलित अहम  रहे है। यादव वोटरों पर 2014  में भी मोदी लहर का असर नहीं पड़ा था। और यादवो ने सपा को धोखा भी नहीं दिया था। इसके साथ ही सपा के साथ अलग से 5 फीसदी मुस्लिम वोटर बढ़ गए थे।  तो गणित यह है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन के पास 35 परसेंट परपंरागत वोट है जो कि 2014 में गिरकर 30 प्रतिशत हो गए थे।  यानि उसके हाथ से पांच परसेंट वोटर चले गए थे।  जीतने के लिए कम से कम 35 प्रतिशत चाहिए तो गठबंधन को जीत हासिल करने के लिए उन पांच फीसदी को वापस अपने खेमे में लाना होगा जिन्हें उन्होंने लोकसभा चुनाव में खो दिया था। अगर गठबंधन खोये हुए 5 फीसदी वोट को वापस नहीं लाता है तो उसकी जीत की संभावना कम हो जायेगी। 
 मायावती को 2012  के विधान सभा चुनाव में 25  फीसदी वोट मिले थे जबकि  2014 के लोक सभा चुनाव में  20 प्रतिशत वोट मिले थे।  उनके मुख्य समर्थक - जाटव दलित उनके साथ ही रहे थे, ठीक उसी तरह जैसे मोदी लहर के बावजूद यादव,  सपा से हिले नहीं थे।  लेकिन मायावती के गैर-जाटव दलित, अगड़ी जाति और गैर-यादव ओबीसी के वोट  जो बीजेपी  परंपरागत वोट है  वे करीब  25 प्रतिशत है। मोदी लहर में मायावती के 5 फीसदी वोट मायावती के कट गए थे। इसलिए मायावती के लिए  जरूरी है कि इस बार वह 15 परसेंट और हासिल करें।   यानि हाथ से निकले 5 प्रतिशत वोट को वापस लाएं और 10 प्रतिशत नए वोटर - जो कि उनकी विरोधी पार्टियों के टार्गेट से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं।  लेकिन राजनीति तो संभावनाओ का खेल है।  यहाँ कुछ भी हो सकता है।  बसपा को आगामी तीन चरणों के चुनाव में ज्यादा दखल देने की जरुरत होगी।  लेकिन एक बात साफ़ है कि अगर पिछले वोट प्रतिशत के आधार पर चुनावी गणित का गणना करे तो स्पष्ट है की अभी सूबे की राजनीति में गठबंधन और बीजेपी के बीच मुकाबला है। बीजेपी को लहर वोट बचाने की चुनौती है तो गठबंधन को अपने खोये 10 फीसदी वोट को वापस लाने की चुनौती है।  यही चुनौती त्रिशंकु विधान सभा की तरफ जाती दिख रही है। 

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