Saturday, March 25, 2017

सत्ता पलटती रही और भूमिहीनों के दर्द बढते गए


                
     अखिलेश  अखिल

देश  में भूमिहीनों, दलितो और आदिवासियों की क्या तस्वीर है और किन राज्यों में कितने लोग सालों से भूमि के लिए दर दर भटक रहे हैं इसकी ताजा तस्वीर  हम आपके सामने रखेंगे लेकिन सबसे पहले एक नजर देष के उन लोगों पर जो दूसरों की जमीन पर जहालत का जीवन जी रहे हैं। इसे देश   की दोगली राजनीति कहें या फिर उन करोड़ो लोगों का दुर्भाग्य जिन्हें आजादी के 70  साल बाद भी खेती के लिए कौन कहे, रहने के लिए भी  10 गज जमीन मयस्सर नहीं है। सरकार की नजरों में ये भूमिहीन है। इनके लिए कई योजनाएं चलाने का दावा हमारी सरकार करती है लेकिन सच तो यही है कि देश  के अधिकतर गरीबों के पास रहने के लिए भी कोई जमीन नहीं है। कुछ साल पहले  एकता परिषद ने दिल्ली कूच किया था। लाखों गरीबों और किसानों ने ग्वालियर से लेकर दिल्ली तक की सड़कों को बाधित किया था  । सरकार जगी। कुछ बाते हुई, वादे हुए , इकरारनामे हुए लेकिन भूमिहीनों को अभी तक मिला कुछ भी नहीं। 
     कहने के लिए देश  की यह बड़ी आवादी पुरखे दर पुरखे गांव में रहते तो नजर आते हैं लेकिन इनका अपना कोई आसरा नहीं होता। जब तक मालिक खुश , इनकी झोपड़ी उनकी जमीन पर टिकी होती है। मालिक के नाखुष होते ही झोपड़ी की गृहस्ती खुले आकाश  के नीचे सिमट जाती है। कहने के लिए तो इन्हीं  70 सालों में सरकार की ओर से गरीबों, भूमिहीनों और किसानों की हिफाजत के लिए दर्जनों कानून बनाए गए । भूमि सुधार का नाटक तो  1950 से ही  देश  में चल रहा है लेकिन 70  साल बीत जाने के बावजूद कुछ एक राज्यों को छोड़ दे तो देश  के किसी भाग में भूमि सुधार देखने को नहीं मिलती है। हां इसी जमीन को लेकर देश  का एक बड़ा हिस्सा नक्सलवाद की चपेट में जरूर आ गया है। आदिवासी नेता अरबिंद नेताम कहते हैं कि ‘इस देश  में कभी भी भूमिहीनों को लेकर कोई सार्थक बहस नहीं हुई है। कहने के लिए कई कानून बन गए लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। हर बार इस मसले पर चर्चा होती है और उस चर्चा को फ्रीज में डाल दिया जाता है। यह कैसी ब्यवस्था चल रही है कि  सरकार के लोग आदिवासियों ,दलितों और भूमिहीनों को जमीन देने की बात करती है लेकिन हालत यह है कि जिनके पास थोड़ी जमीन है भी उनकी जमीन विकास के नाम पर छिनी जा रही है। यहां तो लूट मची हुई है। इस देष में सबसे ज्यादा राजनीति भूमि सुधार को लेकर ही होती है। इस सरकार से कुछ भी संभव नहीं है।’
       विदर्भ जन आंदोलन के नेता किषोर तिवारी भूमि सुधार का नाम आते ही भड़क पड़ते हैं। कहते हैं कि ‘किस देष की बात आप  कर रहे हैं। जिस देष में एक हाथ से सरकार कानून बनाती है और दूसरे हाथ से उसे खारिज भी कर देती है। जब इस देष में  सभी समस्याओं की जड़ में जमीन है तो फिर सरकार के लोग सबसे पहले उसमें सुधार लाने की बात क्यों नहीं करती? आजतक भूमि सुधार क्यों नहीं किया गया? गरीबों को लेकर सरकार चुप क्यों रहती है?
        आगे बढे इससे पहले 2006 के आंकड़ों पर एक नजर। इस आंकड़े के मुताबिक देष में 95.65 फीसदी छोटे और सीमांत किसान  62 फसदी कास्तकारी जमीन के मालिक हैं जबकि 3.5 फसदी मध्यम व बड़ी  श्रेणी के किसान 38 फीसदी जमीन के मालिक हैं। मामला इतना ही नहीं है।  देश  की ग्रामीण आवादी के पास 1993-94 में 61.26 फीसदी खेती की जमीन थी जो अब कम होकर 59.15 फीसदी पर आ गई है। बड़े राज्यों में सबसे ज्यादा खेती की जमीन राजस्थान के पास है। इस राज्य के पास खेती की जमीन 78.17 फीसदी परिवारों के पास है। उत्तरप्रदेश  में 73.78 फीसदी परिवारों के पास खेती की जमीन है जबकि मध्यप्रदेश  के पास 69.30 फीसदी परिवारों के पास खेती की जमीन है। आंकड़ों कंे आधार पर आप कह सकते हैं कि राजस्थान में 23 फीसदी लोग भूमिहीन है जबकि उत्तरप्रदेष और मध्यप्रदेश  में क्रमषः 27 और 30 फसदी लोग भूमिहीन है। सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि 1993-94 में देष के 47.19 फीसदी  दलित परिवारों के पास खेती की जमीने थी जो अब घट कर 44.45 फीसदी परिवारों के पास ही खेती की जमीन रह गई है। यानि उदारीकरण के 26  सालों में 3 फीसदी दलित परिवार भूमिहीन हो गए है। उत्तरप्रदेश  में आज भी 67.37 दलित परिवारों के पास खेती की जमीन होने की बात सामने आ रही है। राजस्थान में 66 फसदी दलितो पास खेती जमीन है जबकि पंजाब के दलित परिवारों में इसका आंकड़ा 10.43 फसदी है। इसी तरह आदिवासियों के पास देश  भर में लगभग 68 फसदी परिवारों के पास खेती की जमीन होने की बात सामने आ रही है। सबसे ज्यादा राजस्थान के  88.83 फीसदी आदिवासी परिवारों के पास खेती की जमीन होने की बात सामने आई है । असम में यह आंकड़ा 87.08 और ओडिसा में यह आंकड़ा 71 76 फसदी है। बाकि राज्यों में आदिवासी परिवारों की हालत कैसी है इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। बिहार के 50.91 फीसदी आदिवासियों के पास कोई जमीन नहीं है। जबकि हरियाणा और महाराष्ट् के क्रमषः 70 और 55 फसदी  आदिवासी परिवारों के पास कोई जमीन नहीं है।इसी तरह पंजाब के 93 और तामिलनाडू के 57 फीसदी आदिवासी परिवार भूमिहीन हैं।
       देश  में  पिछड़ी जाति के आधार पर राजनीति भले ही कितनी भी हो जाए लेकिन सबसे ज्यादा भूमिहीनों की आवादी इसी वर्ग में है। अभी देश  में 57.30 फीसदी ओबीसी परिवार भूमिहीन की श्रेणी में है। देषवार  कुल ग्रामीण श्रमिक परिवारों में  दलित श्रमिकों की आवादी 33.8 फीसदी है।  इनमें से 11.66 परिवार सीमांत किसान की श्रेणी में है और बाकी के 22.15 फीसदी परिवार भूमिहीन है। अगर हम कुल ग्रामीण श्रमिक परिवारों की बात करें तो देष के कुल 59 फसदी परिवार भूमिहीन है। 28 फीसदी परिवार सीमांत किसान है जिनके पास 0.01 से लेकर 0.04 हेक्टेयर जमीन है। इनमें से केवल 0.5 फीसदी परिवारों के पास 2.01 हेक्टेयर जमीन है। पंजाब के 91.10 फीसदी ग्रामीण श्रमिक परिवारों के पास कोई जमीन नहीं है। इसी तरह हरियाणा के 81 फीसदी श्र्रमिक परिवार भूमिहीन है। बढती आवादी और घटते खेतों के रकबों को देखकर ऐसा लग रहा है कि आने वाले दिनों में रहने के लिए जमीन भी कम पउ़ जाएगी। 1993-94 में प्रति परिवार कृषिगत जमीन का रकबा 0.23 हेक्टेयर था जो अब घटकर 0.18 हेक्टेयर रह गया है।
          भूमि एक ऐसा संसाधन है जो जीवन के सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक तंत्र का मूल है। यह केवल खेती का साध नही नहीं वल्कि गांव में रहने वाले लोगों के लिए आत्म सम्मान और नागरिकता का भी प्रमाण है। लेकिन जिसके पास जमीन ही न हो तो उसे क्या कहेंगे? किसी के पास इतनी जमीन है कि उसे देखने वाला कोई नहीं ।  आदिवासी नेता मनमोहन साह बट्टी कहते हैं कि ‘सरकार ने नई आर्थिक नीति के तहत  आदिवासियों और दलितों को और कमजोर कर दिया है। विकास परियोजनाओं में विस्थपित आदिवासियों की संख्या सबसे अधिक है।जनसंख्याा का केवल 9 फसदी भाग ही आदिवासी है जबकि अभी तक अधिग्रहित भूमि में इनकी भूमि का हिस्सा 40 फीसदी है। पेसा कानून 1996 में बना लेकिन इस के बाद भी आदिवासियों की जमीन कम होती जा रही है। अब तो गंभीर लड़ाई लडने का समय आ गया है।’ पिछले दो दषकों लगभग 7 लाख 50 हजार  एकड़ भूमि खनन, खदान के लिए और 2 लाख 50 हजार  एकड़ भूमि औद्योगीकरण  के नाम पर हस्तांतरित हो चुकी है।    
 

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