Friday, March 31, 2017

पीएम मोदी और सीएम नीतीश की राजनीति में अटकी विकास गाथा



अखिलेश अखिल 

 आज की राजनीति में जब चुनाव जीतने और हारने की ही बाजी लगी है तो बहस इस बात की चल पड़ी है कि आखिर पीएम मोदी  के चमत्कारिक चुनावी राजनीति को कौन रोके ? यह रोकने की बात समझ से पड़े है।  हर समय में किसी ना किसी ख़ास पुरुष का राजनीति में पदार्पण होता है तो समाज में अपनी छवि का लाभ उठाता है।  डर से ,प्रेम से ,प्यार से , भक्ति भावना से या फिर अपने विराट आकर्षण से। लेकिन कोई भी आकर्षण स्थाई नहीं।  इतिहास गवाह है।  हां प्रजापालक और राष्ट्र निर्माण के चहेते चेहरे जनता को खूब भाते है।  उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में देश की जनता के दुःख दूर होंगे।   देश में बहस इस बात को लेकर भी है कि राजनितिक स्तर पर नितीश कुमार  मोदी को चुनौती दे सकते है।  गजब की राजनीति है।  नीतीश  जी ने मोदी का विरोध करके ही एनडीए  से नाता तोड़ा था।  और आज  विरोध की राजनीति करते करते सबसे नजदीकी मोदी और नीतीश ही बने हुए है।  तो क्या विकास के प्रति इन दोनों नेताओ का रसायन एक है ? लेकिन सच यही है कि अभी तक ना मोदी और ना ही नीतीश जी कोई लैंडमार्क काम किये है जिससे लगे कि इनके हाथ देश बदल सकता है।  नीतीश जी शराबबंदी के लिए ख्यात है तो मोदी जी नोटबंदी के लिए।  दोनों बंदी का अपना मिजाज और रसायन है।  हम नितीश जी से कुछ आग्रह करेंगे लेकिन पहले पीएम मोदी की राजनीति पर एक नजर। 
     प्रधानमन्त्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी यही पूरा नाम है हमारे प्रधानमंत्री का।  पूरा देश देख और समझ रहा है कि पीएम मोदी के भीतर कोई कोई ऐसी चमत्कारिक शक्ति है जो जनता को अपनी तरफ बरबस खिंचती चली आती है।  विरोधी भी मोदी जी के जलवा से हतप्रभ है।  बहुत साल के बाद कोई चमत्कारिक नेता हमारे देश को मिला है।  मोदी से पहले नेहरू और इंदिरा के चमत्कार से भी तब के विरोधी दंग और बेदम थे।  यह बात और है कि लगभग तीन साल के भीतर मोदी शासन ने हमारी मूलभूत समस्या पर कोई करारी चोट नहीं की है जिससे कहा जाए कि देश बदल गया है।  आर्थिक और सामाजिक स्तर पर।  भूख ,गरीबी ,बेकारी ,अशिक्षा और बिमारी हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है।  इस समस्या से देश का हर नागरिक परेशान है।  चाहे वह मोदी जी के भक्त हो या फिर विरोधी।  लेकिन मोदी के आने के बाद देश का मिजाज बदल गया है।  सोच और समझ में बदलाव आ गए है।  जो लोग छुपकर हिन्दू मुसलमान की बाते किया करते थे वे अब खुलकर धर्म का माला जपने लगे है।  कह सकते है कि हमारा देश पहले से ज्यादा धार्मिक और राष्ट्र भक्त हो गया है।  होना भी चाहिए।  लेकिन असली सवाल वही है कि रोजगार के अभाव में पलायन होते लोगो को कहानी और खाली होते गाव की दुर्दशा ७० साल की आजादी पर ही सवाल खड़ा कर रहा है। बेकारी की मार इस सदी से पहले कभी इतनी भयानक नहीं देखी  गयी। उजड़ते किसान और मौत को गले लगाते देश के अन्नदाता इस सदी से पहले इतने हताश और निराश कभी  नहीं दिखे।  कुकर्म ,बलात्कार और तमाम अनैतिक कारगुजारी इस सदी की अगर सबसे बड़ी पहचान है तो भ्रष्टाचार में शामिल अधिकतर मंत्री ,संत्री ,नौकरशाह , सिपाही से लेकर डॉक्टर ,अभियंता ,खिलाड़ी ,मीडिया ,समाजसेवी ,मुखिया ,सरपंच ,सांसद ,विधायक, न्यायपालिका  के साथ लोभी जनता इस लोकतंत्र की ताकत बनने की जगह हमारी सबसे बड़ी कमजोरी सावित हो रही है।  जाहिर है यह लोकतंत्र के नाम पर कलंक है।  पीएम मोदी से आज भी सबको उम्मीद है कि वे देश की मौलिक समस्याओं से निजात दिलाएंगे। हे मोदी जी देश को बदल डालिये ताकि हमारी अगली पीढ़ी भी आपको याद कर सके।  
        क्या आज की राजनीति केवल चुनाव जितने और हारने तक सिमट गयी है।  क्या राजनीति का मतलब केवल देश को फतह करना रह गया है ? क्या राजनीति का मतलब केवल जनता को गुमराह कर अपनी सत्ता स्थापित करना भर रह गया है।  ये बाते इसलिए कही जा रही है कि पिछले 3 दशक  की राजनीति को अगर अगड़े ,पिछड़े ,दलित ,मुसलमान के वोट बैंक पर टिकी रही है तो इन्ही 30 सालों में बदलाव के नाम पर केवल सवर्णो की जगह दलित , पिछड़े की राजनीति आगे बढ़ती दिखी है।  जो एक शुभ संकेत है।  जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी राजनीति।  लेकिन इन्ही ३० सालों में तमाम तरह के दुःख , बिमारी ,पलायन ,बेकारी , भूख और गरीबी देश को दुनिया के नक़्शे पर सबसे बदनाम कर रखा है।  आखिर क्यों ?  आजादी के बाद इस देश में जितनी भी राजनितिक पार्टी जनता के बीच पहुची ,सबने राजनीति और सत्ता का स्वाद तो खूब लिया।  भ्रष्टाचार तो खूब किया।  लेकिन दिया क्या ? कल तक दूसरी पार्टी में रहकर लूट मचा रहे थे आज किसी दूसरी पार्टी में जाकर संत की भूमिका में आसीन है।  मानव का यह चरित्र सदा ही शोध का विषय रहा है। कह सकते है कि देश का मिजाज बदल रहा है और नियत ओ नियति भी बदलाव के लिए छटपटा रहे है। 
         और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हठी राजनीति तो सबके सामने है।  वे बेबाक है और बिहारी मिजाज के लायक भी।  संसदीय राजनीति की लंबी समझ है और लोक निर्माण की कला के भी वे पारंगत है। बिहार को नीतीश जी पर गर्व है और उनके प्रति सम्मान भी बिहार से बाहर रह रहे बिहारियो के लिए वे पूज्य भी है।  इन्ही की वजह से आज गाली बिहारी शब्द सम्मानित शब्द बन गया है।  नितीश जी शराबबंदी के हीरो है।  एक गरीब प्रदेश और समाज को शराब के नशे से दूर ले जाने का प्रयास गांधी के सपनो को साकार करने जैसा है।  लेकिन सच यही है कि बिहार अभी नहीं बदला।  हमारी समस्या नहीं बदली।  हमारे दुःख दर्द नहीं दूर हुए।  कहानी चाहे गंगा आर की हो चाहे गंगा पार की।  बिहार आज भी अशिक्षा , बिमारी ,दुःख , बेकारी और पलायन से आंसू बहा रहा है।  बड़े अरमान से गठबंधन को जीत दिलाई थी बिहारी समाज ने लेकिन हर हाथ को काम और सबको दाम की उम्मीद पूरी नहीं हो सकी है। बिहार के शिक्षा संस्थान ढहते नजर आ रहे है।  नीतीश जी से उम्मीद है कि बिहार को बदलेंगे ताकि बिहार गौरब बन सके। 

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