Tuesday, April 4, 2017

चीन के गले में फांस की तरह चुभते है दलाई लामा



अखिलेश अखिल 
तिब्‍बती धर्मगुरु दलाई लामा की  अरुणाचल यात्रा पर सबकी नजरें टिकी है। पूरी दुनिया दलाई लामा की इस यात्रा के बाद की संभावित चीनी एक्शन को भी समझ रही है।  चीन ,दलाई लामा की इस यात्रा का विरोध कर रहा है।  दलाई लामा अरुणाचल के तवांग हिस्से में  6 अप्रैल को जा रहे है।  जबकि चीन तवांग को विवादित इलाका मानता है और अपना हिसा कहता है।  चीन दलाई लामा को एक अलगाववादी नेता मानते हुए उन्‍हें देश के लिए खतरा बताता है। वह हमेशा दूसरे देशों पर 'वन चाइना पॉलिसी' के तहत दलाई लामा का स्‍वागत न करने का दबाव डालता है। आज भी हजारों की संख्‍या में तिब्‍बती सीमा पार कर भारत में दाखिल होते हैं और उनका मकसद सिर्फ दलाई लामा को देखना होता है। दलाई लामा ने आखिरी बार वर्ष 2009 में तवांग का दौरा किया था। उस समय नेपाल और भूटान से करीब 30,000 अनुयायी उन्‍हें सुनने के लिए पहुंचे थे।

             दलाई लामा एक संन्‍यासी हैं और वर्तमान में 14वें दलाई लामा हैं जो तिब्‍बतियों के धर्मगुरु हैं। कहते हैं कि दलाई लामा एक अवलौकितेश्‍वर या तिब्‍बत में जिसे चेनेरेजिंग कहते हैं, वह स्‍वरूप हैं। उन्‍हें बोधिसत्‍व और तिब्‍बत का संरक्षक माना जाता है। बौद्ध धर्म में बोद्धिसत्‍व वे होते हैं जो मानवता की सेवा के लिए फिर से जन्‍म लेने का निश्‍चय लेते हैं।
               असम और अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर जो दलाई लामा जा रहे हैं वे 14वें लामा हैं। दलाई लामा का जन्‍म नार्थ तिब्‍बत के आमदो स्थित एक गांव जिसे तकछेर कहते हैं, वहां पर छह जुलाई 1935 को हुआ था। दलाई लामा का असली नाम ल्‍हामो दोंडुब है। इस बच्‍चे की उम्र जब सिर्फ दो वर्ष थी तो इसे 13वें दलाई लामा थुबतेन ग्‍यात्‍सो का अवतार माना गया और 14वां दलाई लामा घोषित किया गया। वर्ष 1959 में जब दलाई लामा 23 वर्ष के थे तो उन्‍होंने ल्‍हासा में अपने फाइनल एग्‍जाम दिए और इस एग्‍जाम को उन्‍होंने ऑनर्स के साथ पास किया। 14वें दलाई लामा के रूप में वह 29 मई 2011 तक तिब्‍बत के राष्‍ट्राध्‍यक्ष रहे थे। इस दिन उन्‍होंने अपनी सारी शक्तियां तिब्‍बत की सरकार को दे दी थीं और आज वह सिर्फ तिब्‍बती धर्मगुरु हैं। वर्ष 1949 में चीन ने तिब्‍बत पर हमला किया और इस हमले के एक वर्ष बाद यानी वर्ष 1950 में दलाई लामा से तिब्‍बत की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए अनुरोध किया गया।
              चीन तिब्‍बत को अपना हिस्‍सा मानता है। वर्ष 1954 में दलाई लामा चीन के माओ जेडॉन्‍ग और दूसरे चीनी नेताओं के साथ शांति वार्ता के लिए बीजिंग गए। इस ग्रुप में चीन के प्रभावी नेता डेंग जियोपिंग और चाउ एन लाइ भी शामिल थे। वर्ष 1959 में चीन की सेना ने ल्‍हासा में तिब्‍बत के लिए जारी संघर्ष को कुचल दिया। तब से ही दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में निर्वासित जिंदगी बिता रहे हैं। धर्मशाला आज तिब्‍बती की राजनीति का सक्रिय केंद्र बन गया है।
             दलाई लामा को वर्ष 1989 में शांति के नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था। अब तक दलाई लामा 62 से भी ज्‍यादा देशों की यात्रा कर चुके हैं और कई देशों के राष्‍ट्राध्‍यक्षों से भी मुलाकात कर चुके हैं। उन्‍हें वर्ष 1959 से लेक‍र अब तक 84 से भी ज्‍यादा सम्‍मान से नवाजा जा चुका है। उन्‍होंने 72 से भी ज्‍यादा किताबें लिखी हैं। मार्च 1959 में जब दलाई लामा भारत आए तो उनका जोरादार स्‍वागत हुआ और इस स्‍वागत से चीन के शीर्ष नेता माओ जेडॉन्‍ग को काफी नाराजगी थी। जब माओ ने बयान दिया कि ल्‍हासा में विद्रोह की वजह भारत है तो चीन और भारत के बीच तनाव एक नए स्‍तर पर पहुंच गया।

जब चीन ने वर्ष 1959 में इस बात का ऐलान किया था कि वह तिब्‍बत पर कब्‍जा करेगा तो भारत की ओर से एक चिट्ठी भेजी गई थी। भारत ने चीन को तिब्‍बत मुद्दे में हस्‍तक्षेप का प्रस्‍ताव दिया था। चीन उस समय मानता था कि तिब्‍बत में उसके शासन के लिए भारत सबसे बड़ा खतरा बन गया है। वर्ष 1962 में चीन और भारत के बीच युद्ध की यह एक अहम वजह थी।
मार्च 1959 में जब दलाई लामा जब चीनी सेना से बचकर भारत में दाखिल हुए तो वह सबसे पहले अरुणाचल प्रदेश के तवांग पहुंचे। यहां से वह 18 अप्रैल को असम के तेजपुर पहुंचे। वर्ष 2003 में दलाई लामा ने बयान दिया और कहा कि तवांग असल में तिब्‍बत का हिस्‍सा है। वर्ष 2008 में उन्‍होंने अपनी स्थिति बदल ली। मैकमोहन रेखा पहचानते हुए उन्‍होंने तवांग को भारत का हिस्‍सा बताया। अब देखना है कि दलाई लामा की तवांग यात्रा पर चीन क्या प्रतिक्रया देता है।  
       

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