Monday, April 17, 2017

सरकार वही जो जनता मन भाये ---

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अखिलेश अखिल 
लोकतंत्र में किसी भी सरकार को मात्र एक ही कसौटी पर जांचिए कि जो वह कह रही है और जनता के विकास -कल्याण  के नाम पर योजनाएं बना कर प्रचारित प्रसारित कर रही है ,क्या जनता के बीच वह योजना है और क्या जनता को उसका लाभ मिल रहा है ? अगर ऐसा है तो उस सरकार को गले लगाने की जरुरत है और अगर ऐसा नहीं है तो तो उसे बर्दास्त करना किसी जुर्म से कम नहीं।  हवाबाज सरकार और ठग तंत्र के बारे में चाणक्य भी बहुत कुछ कह गए है।  जो सरकार जनता की हितैषी नहीं उसके साथ मुरौवत कैसा ? अगर आप जातिवादी ,अंधभक्ति ,कथित धार्मिक ,लोभी ,ठग और बेईमान और भ्रष्ट  जनता नहीं है और किसी ख़ास नेता के प्रति समर्पित नहीं हैं तो  चाहे वह केंद्र की सरकार हो या फिर राज्य की सरकार या फिर स्थानीय मुखिया -सरपंची वाली सरकार की योजनाओं को परखिये और देखिये कि आपके आस पास की समस्याएं क्या है और साकार क्या -क्या कर रही है ? 
       इंसान को जीने के लिए सबसे पहले रोटी की जरूरत होती है। फिर देह ढकने के लिए कपडे की जरूरत पड़ती है और फिर सिर छुपाने के लिए किसी भी तरह की छत चाहिए।  जो लोग आज भी इन समस्यायों से घिरे हुए हैं उनके पास भीख मांगकर जान बचाने के अलावा कोई रास्ता नहीं।  माना जा रहा है कि देश में 70 लाख से ज्यादा आवादी भीख मांगंने वालों की है।  जाहिर है इसके विकास के लिए सरकार की साड़ी योजनाएं बेकार है।  सरकार की किसी भी योजना में ये लोग शामिल नहीं हैं और सरकारी तंत्र और दलाल वर्ग इनके हिस्से की योजना भी हड़प जाते है। इस आवादी के लिए सरकार रहे या जाए क्या फर्क पड़ता है ? 
     आपके गांव -जवार और अगल बगल में बहुत सारे स्कूल नुमा ढाँचे मिल जाएंगे।  शिक्षा सबको मिले यही सोचकर सरकारी अमले खा पीकर इस तरह के ढाँचे तैयार करते है।  इस ढाँचे को बनाने के पीछे स्कूली शिक्षा देना नहीं है ,मतलब होता है कि इसक ढाँचे को बनने में उसके और और अन्य दलालों को कितनी कमाई हो सकती है।  बाद में जो ढांचा तैयार होता है वह कुछ दिनो बाद गिर भी जाए तो किसी को कोई आपत्ति नहीं।  और वैसे स्कूलों में कैसी शिक्षा दी जा रही है और जो शिक्षक शिक्षा देने पहुंचे है उनकी योग्यता और करतूत की जानकारी रखियेगा तो तबाह हो जाइयेगा।  कह सकते है कि जब शहरी सरकारी स्कूलों में ढंग की पढ़ाई नहीं होती तो भला गांव की क्या औकात ? कई दशक से इसी तरह की शिक्षा व्यवस्था को हम झेल रहे है। बचपन से आप जवान हो गए होंगे लेकिन अपने गांव में स्कूल की पढ़ाई को जांचने वाला कोई सरकारी अधिकारी को आते आपने नहीं देखा होगा।  जबकि सरकार ने सारी व्यवस्था  कर रखी है। और अपने गांव के उस मुखिया -सरपंच के बारे में आपकी जो भी राय है इतना तो समझ ही लीजिये की वह एक नंबर का गिरहकट है और मिल बांटकर खाने वाला आदमी।  स्थानीय स्तर पर लाखों की योजनाओं को वह खा जाता है और लोकतंत्र मुस्कुराता रहता है।  आपने कभी अपने गांव में कलेक्टर को आते देखा है ? जिला स्तर की सभी योजनाए वही बनाते है।  लेकिन जनता को वह योजना पहुंची या नहीं ,इससे उन्हें कोई मतलब नहीं।  उनको अपना कट मिल जाता है और उनके चमचे योजना की सफल जानकारी उनतक पहुंचा देते है। 
        चुनाव के दौरान क्या होता है इसकी जानकारी आपको ज्यादा ही होती है।  क्योंकि गाँव के लोग अब पहले से ज्यादा चतुर हो गए है।  सारे गाँव की आवादी की बोली लग जाती है। अलग अलग तरह का रंग रूप बनाये और अलग अलग चुनाव चिन्ह लिए जिसमे जाति ,धर्म ,राष्ट्र , अपमान ,मान की बातें निहित होती है ,वे किसी बड़े ठग और मजमाबाज से कम नहीं।  चुकी आप लोभी है इसलिए वे आपको पहले धर्म ,जाति ,राष्ट्र ,मठ ,मंदिर मोदी ,लालू ,मुलायम, ममता , नितीश और ना जाने क्या क्या के नाम पर बरगलाते है और जब तब भी बात नहीं बनती तो पैसे की लालच के सामने आप वह सब करते है जो वह चतुर सुजान चाहता है। खैर जाने दीजिये। 
     सरकार कहती है कि सबको स्वस्थ रखा जाएगा।  सबको दबाई ,सबको इलाज देने की बात भी खूब होती है।  क्या आपके गाँव में कभी कोई डॉक्टर आता है ? किसी गरीब गुरबा का इलाज संभव है ? हर बिमारी में आपको अपने मरीज को लेकर शहर की तरफ ही जाना पड़ता है।  आखिर क्यों ? सरकार करती क्या है ? 
     और आप जानते है की आपके विधायक ,सांसद और मंत्री संत्री करते क्या है ? आपके बलबूते राजा ,जमींदार की जिंदगी जीते है और कभी आपसे मिलते भी नहीं। आदिवासी इलाके और गरीब क्षेत्रों में चले जाएँ तो आपकी आँखे फटी की फटी रह जायेगी।  आज भी ये इंसान की जिंदगी नहीं जी पाते।  ७० साल की आजादी का ना इनके लिए कोई मतलब है ना ही उन लोगों के लिए जिन्हे सरकार की योजनाओ का लाभ नहीं मिलता।  फिर कैसी सरकार ? जो जनता की उम्मीदों पर खड़ी नहीं उतर सकती उस सरकार को भला कैसे मन में बैठाया जाय ? 

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