Monday, April 17, 2017

हे निर्लज और ठग राजनीति, तुम गांधी को याद मत करो


अखिलेश अखिल 
जिसने पूरी दुनिया को सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया वही गांधी अपने ही देश में असत्य और हिंसा का शिकार हो गया। जिस गांधी ने दलितों के कल्याण के लिए जाने कितने सपने देखे ,उसी के देश में आज भी दलित- बंचित  समाज के सबसे पिछले पायदान पर खड़े हैं । जिस लाठी और लंगोटी वाले गांधी ने 'अल्लाह ईश्वर तेरे नाम सबको सनमत दे भगवान् 'की स्तुति से हिन्दू -मुस्लिम एकता की कल्पना की उसी गांधी के सामने हिन्दू -मुसलमानो ने खुनी नर्तन किया और देश -राष्ट्र की एकता के बजाय धर्म के नाम मानवता को शर्मशार करते रहे। और जब गांधी दुनिया छोड़ चले  गए तो  उसी अल्लाह -ईश्वर की संतान हिन्दू -मुसलमान देश की बजबजाती राजनीति के खिलाड़ी हो गए। फिर गांधी को माना किसने ? गांधी को जाना किसने ? गांधी को बरन किया किसने ? आजादी के बाद गांधी के नाम की राजनीति सबने की। गांधी को सबने टुकड़ों -टुकड़ों में बेचा।  उनके आदर्शो की सबने हत्या की।  गांधी  के ग्रामीण स्वराज के साथ सबने छल किया और गांधी को मजाक का पात्र बना डाला। 
      समाज के अंतिम व्यक्ति को लाभ पहुंचाने की योजना कहा चली गयी ? दलितों ,पिछडो ,वंचितों।आदिवासियों  और अलपसंख्यकों के साथ ही गरीब और असहाय लोगों के विकास के नाम पर ना जाने इस देश में कितनी योजनाएं बनी। योजनाएं चलती रही ,आज भी चल रही है लेकिन जिसके लिए योजनाएं बनी वहाँ पहुंची ही नहीं।  साड़ी योजनाएं बीच रास्ते में ही लूट की शिकार हो गयी। लूटने वाले कौन थे या कौन है ? वही राजनीति करने का कम्बल ओढ़े नेतानुमा डकैत, लम्पट और गिरहकट लोग।  इनके साथ में खड़े रहे अधिकतर नौकरशाह और समाज के दलाल।  कांग्रेस की राजनीति जब तक कुलांचे मार रही थी गांधी की तस्वीर हर जगह दिखाई पड़ती थी। लेकिन गांधी की तस्वीर के नीचे घूसखोरी और भ्रष्टाचार के कारनामे भी खूब होते रहे।  जब जब कांग्रेस की सत्ता बदली तो डकैत नुमा नेता कांग्रेस से अलग होकर सत्ताधारी दल के साथ होते गए। इस तरह 70 साल गुजर गए।  आज बीजेपी की केंद्र से लेकर अधिकतर राज्यों में सरकार है।  गौर से उन चेहरों को देखिये तो पता चल जाता है कि आज की सफल बीजेपी राजनीति में पाक साफ़ दिखने का दम्भ भरते जो नेता दिख रहे है उनका अतीत बड़ा ही भयानक रहा है।  कह सकते है कि अब तक किसी भी सरकार ने सच्चे मन से गांधी के सपनों को साकार नहीं किया। 
        हर साल गांधी जयंती आती है और रश्म अदाएगी हो जाती है। इस बार तो कुछ ज्यादा ही गांधी के नाम होते रहने का ढिढोरा पिटा जा रहा है।  चम्पारण सत्याग्रह के नाम पर ना जाने कितने करोड़ की योजनाए केंद्र से लेकर राज्य सरकार चला रही है इसकी जानकारी तो अभी तक नहीं मिल पायी है लेकिन सच तो यही है की चम्पारण सत्याग्रह के सौ बरस पुरे होने के नाम जो कुछ भी किया जा रहा है या होते दिख रहा है उसमे गांधी का दर्शन कही नहीं है।  सच तो यही है कि किसी महापुरुष को याद करने से उसके बताये रास्ते पर चलना जरुरी है।  उसके दर्शन को आत्मशात करने की जरुरत है और उसके सर्वधर्म समभाव को समाज और देश में लागू करने की जरुरत है।  लेकिन ऐसा है कहाँ ?
      सच तो यही है कि गांधीमार्ग पर चलना किसी के बूते की बात नहीं। जो सच्चा होगा ,जो सर्वधर्मी होगा  और जिसके मन में सबके लिए करुणा होगी ,जो निष्कलंक होगा और जो अहिंसक होगा आखिर गांधी के मार्ग पर तो वही चल सकेगा।  लेकिन वर्तमान राजनीति में ऐसा है कौन ? कौन नेता है जो सत्य और अहिंसा का वरन किये आगे बढ़ता दिखता है ? जहा चुनावी राजनीति सामने आती है वहा गांधी की कोई महत्ता नहीं।  चुनावी राजनीति में गांधी दर्शन का कोई अस्तित्व नहीं। ठगिनी राजनीति और झूठे और बेईमान नेता गांधी को अब तक मजाक ही बनाते रहे है।  आगे भी बनाते रहेंगे।  अगर ऐसा नहीं होता तो जिस चम्पारण में जाकर गांधी ने किसानो की लाचारी को समझकर 9 महीने तक किसानो की दशा और दुर्दशा के विरोध में बर्बर अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी , आज क्या संभव है ? देश के किसी भी हिस्से में आप चले जाएँ आज भी किसानो की हालत तब के चम्पारण के निलहे किसान से कुछ कम नहीं हैं। 
 फिर गांधी की चम्पारण शताब्दी कैसी ? आज की लोभी और भोगी राजनीति में गांधी कहाँ है ? पूरा समाज राम रहीम के फेर में ना जाने क्या क्या गलतफहमियां पाले धर्म और मजहब के नाम वह सब करने को तैयार है जिसकी कल्पना इन्हे बनाने वाले ईश्वर और खुदा ने भी नहीं की होगी।  फिर राम और रहीम को देखा किसने ? लेकिन गांधी को तो हमने देखा है ,परखा है ,समझा है और उनके आदर्शों को जिया है।  सत्य और अहिंसा का इतना बड़ा पुजारी क्या किसी देवतुल्य से कम है।  लेकिन आँखों से देखने के बाद भी हम ईश्वर तुल्य महामानव को ठगते चले गए।  ठगनी राजनीति ने गांधी को भी छल लिया। 

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