Monday, April 17, 2017

तीनकठिया के फंदे को तोड़ने वाला विराट महामानव गांधी


अखिलेश अखिल 
मोहन दास करम चाँद गांधी।  तब उनका नाम यही था।  जब चम्पारण की धरती पर निलहे किसानो की दशा और उनकी हालात का जायजा लेने मोहनदास करमचंद गांधी चम्पारण की धरती पर उतरे और अंग्रेजों से सवाल जबाब किया तो चम्पारण की गरीब जनता इस दुबले पतले और फ़क़ीर नुमा आदमी का मानो गुलाम सा हो गया।  गांधी  को लोगों ने भगवान् मान लिया।  लोगो को लगने लगा कि इस धरती पर और खासकर चम्पारण  का उद्धार करने के लिए ही ईश्वर ने इस आदमी को यहाँ भेज दिया है। चम्पारण का दर्द तब बड़ा ही विकत था।   रैयतों को न केवल जमीन की मालगुजारी, बल्कि फसल पर भी कर देना पड़ता। खेतों में मजदूरों को या तो मुफ्त खटवाया जाता या 10 पैसे थमा दिए जाते। गोरों का दबदबा इतना था कि इलाके के जागीरदारों तक की मजाल न थी कि नीलहों के खिलाफ जुबान खोलें। रैयतों की झोपड़ी जला देना, औरत-मर्दों की धुनाई, बेदखली आदि अत्याचार आए दिन होते ही रहते।  ऐसे हालातों में ही राजकुमार शुक्ल किसानों की दुर्दशा मिटाने गांधीजी को चंपारण लाए थे। उन दिनों भारत में गांधी को कम ही लोग जानते थे। राजकुमार शुक्ल चंपारण के मामूली किसान थे। उनके साथ गांधीजी निकल तो पड़े लेकिन पटना पहुंचते ही उन्हें लगने लगा कि काम कठिन है, ऐसे में उन्होंने कमान खुद संभालना तय किया। लंदन में पढ़ाई के दिनों में मौलाना मजहरूल हक उनके सहपाठी थे।
मोतिहारी रवाना होने से पहले गांधीजी तीन दिनों तक मुजफ्फरपुर रुके थे। वहां नीलहा साहबों का संगठन ‘प्लांटर्स एसोसिएशन’ के सेक्रेटरी ने बड़ी नाराजगी में उनसे पूछा था कि कोठी की जायदाद-काश्तकारी वगैरह के मामले में उन जैसा कोई बाहरी शख्स क्यों दखल देगा? तिरहुत के कमिश्नर ने भी उन्हें तुरंत वापस जाने की हिदायत दी लेकिन पांव पीछे खींचना गांधी की फितरत में न था। वह 15 अप्रैल, 1917 को मोतिहारी पहुंचे। अगली सुबह पड़ताल के सिलसिले में केसरिया थाने के जसौलीपट्टी जाते समय दरोगा ने उन तक जिले के एसपी का सलाम पहुंचा दिया, जिसका प्रशासनिक अर्थ था कि उन्हें फौरन तलब किया गया है। धरणीधर बाबू और रामनवमी बाबू को गंतव्य की ओर भेज गांधीजी लौट आए। वहां पर वह नोटिस तामील हुई, जिसके मुताबिक उन्हें फौरन चंपारण छोड़ देने का हुक्म था। पावती रसीद पर गांधीजी ने दर्ज कर दिया कि जांच जब तक पूरी नहीं हो जाती, चंपारण छोडऩे का उनका बिल्कुल इरादा नहीं। लिहाजा, उन पर मुकदमा चला। 18 अप्रैल, 1917 को कोर्ट में पेशी हुई। मजिस्ट्रेट ने पूछा, क्या आपका कोई वकील है?’ गांधीजी ने कहा, नहीं, अपना पक्ष मैं खुद रखूंगा।’ उन्होंने अंग्रेजी में लिखा बयान पढऩा शुरू किया, मैंने सरकारी आदेश का उल्लंघन इसलिए नहीं किया कि मेरे मन में सरकार के प्रति अनादर के भाव हैं, बल्कि इसलिए कि अंतरात्मा की उच्चतर आज्ञा का पालन मैंने अधिक उचित समझा है।
 गांधी के इस बयान को जानिये तो साफ़ हो जाता है कि  गांधी जितना लचीला थे उतना ही जिद्दी भी। उन्होंने कहा था कि  'मैं यहां उन रैयतों के आग्रह पर आया हूं जिनकी शिकायत है कि नीलहा साहब लोग उनके साथ न्यायोचित व्यवहार नहीं करते। मैं उनकी कोई सहायता कैसे कर सकता था, जब तक वस्तुस्थिति की सच्चाई स्वयं देख-समझ न लूं? मैं स्वेच्छापूर्वक यह इलाका तब तक नहीं छोड़ सकता, जब तक काम पूरा न हो जाए। अत: अपने निष्कासन का भार अपनी ओर से मैं भी प्रशासन को ही सौंपता हूं। मैंने कानून की अवज्ञा अवश्य की है, परन्तु बिना किसी विरोध के उसका दंड भुगतने को भी तैयार हूं।’ 
किसी मुकदमे में ऐसा सच्चा, निडर और कृतसंकल्प बयान शायद ही कभी सुना गया हो। कोर्ट में सन्नाटा पसर गया। मजिस्ट्रेट चकरा गए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसे केस में क्या फैसला दिया जाए, जिसमें अभियुक्त खुद ही आरोप स्वीकार कर दंड तो मांग रहा हो, किंतु अपने उद्देश्य और अभियान के प्रति अडिग खड़ा हो। तब तो यही देखना बाकी रहा कि मढ़े गए दोष और व्यवहार क्या कानून की दृष्टि में दंडनीय अपराध हैं? नतीजतन, पड़ताल में तेजी आ गई। मोतिहारी के बंजरिया पंडाल स्थित सत्याग्रह कार्यालय में बयान दर्ज करवाने वाले रैयतों का हुजूम उमडऩे लगा। 5000 से अधिक रैयतों के बयान दर्ज हुए। कुछ ही महीने बाद प्रांतीय सरकार ने भी जांच समिति गठित कर दी, जिसमें गांधीजी भी मनोनीत किए गए थे। उस समिति की अनुशंसा पर लगभग 100 साल पुरानी तिनकठिया प्रथा कानूनी तौर पर सदा के लिए समाप्त कर दी गई।     
      गांधी का यह सत्याग्रह आज से 100 बरस पहले शुरू हुआ था।  तब गांधी इस देश के नेता नहीं थे।  लेकिन जुर्म के खिलाफ गांधी का अहिंसक आंदोलन जितना अडिग था उतना ही भयावह भी।  इसके पीछे का सत्य यही है कि देश के लोग , किसान और युवा गांधी के साथ खड़े थे।  100 बरस पहले देश में किसानो की जो हालत थी वही हालत आज भी है लेकिन आज वैसा गांधी कोई दिखाई नहीं देता जो किसान और मजदूरों की समस्या को दूर कर सके।  देश के युवा ,विद्यार्थी  आज भी गांधी के रास्तों पर चल पड़े तो देश साड़ी समस्या ख़त्म हो सकती है।                      

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