Tuesday, April 4, 2017

नरमुंड पहने बिलखते किसान गा रहे है लोकतंत्र जिंदाबाद !



अखिलेश अखिल 

देश में किसानों की क्या हालत है इस पर हम चर्चा करेंगे और ले चलेंगे दिल्ली के जंतर मंतर की तरफ जहां दर्जनों किसान अपने मृत सेज सम्बन्धियो के नरमुंडो को अपने में गले में डाले सत्ता सरकार से अपने हक़ हकूक की मांग कर रहे है।  लेकिन सबसे पहले किसान ,उसके कर्ज और कॉर्पोरेट जगत की हालत पर एक नजर -
      देश में बहस चल रही है कि कर्ज से दुबे आत्महत्या कर रहे किसानों के कर्ज माफ़ किये जाए या नहीं।  यूपी चुनाव के वक्त बीजेपी ने सरकार बनने पर किसानों के कर्ज माफ़ करने  का ऐलान किया था।  लेकिन इस ऐलान के तुरंत बाद एसबीआई की चेरमान अरुंधति भट्टाचार्य ने कहा कि किसानों की कर्जमाफी देश के वित्तीय अनुशासन को बिगाड़ सकती है। इसलिए किसानों की कर्जमाफी ठीक नहीं। ऐसे में सवाल यह है कि किसानों की कर्जमाफी ठीक नहीं है तो किस आधार पर बैंको ने सिर्फ तीन साल में पूंजीपति कर्जदारों के सवा लाख करोड़ के कर्ज को बट्टे खाते में दाल दिया।  यानी राईट ऑफ कर दिया। अगर पिछले १५ साल के रिकार्ड को देखे तो यह रकम तीन लाख करोड़ तक जा सकता है।  यह वह रकम है जिसे लौटने की कोई संभावना नहीं होती। ज़रा खेल देखिये।  बैंको के कर्ज में जहां उद्योगपतियों की हिस्सेदारी 41.71  फीसदी है वही किसानों की सिर्फ 13 . 49  फीसदी। जाहिर है बड़े लोगो पर ही बैको के ज्यादा कर्ज है। अब ज़रा उद्योगपतियों के यहाँ फसे कर्ज की कहानी देख लीजिये।  2015 में एनपीए 3 लाख 49 हजार 556 करोड़ रुपये के थे जो सितंबर 2016 में बढ़कर 6 लाख 68 हजार 823 करोड़ हो गए थे। सरकार का दावा है कि आर्थिक हालत ठीक होने पर एनपीए में कमी आएगी।  लेकिन इसी तरह की छूट किसानों को सरकार नहीं देती। अगर सरकार किसानों को भी इसी तरह की मदद करती तो 2 साल के भीतर 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या नहीं करते। एक सच्चाई यह भी है कि देश के 9 करोड़ किसानों पर 12 लाख करोड़ का कर्ज है जबकि 10 बड़े कॉर्पोरेट हाउस पर 5 लाख 72 हजार 682 करोड़ का कर्ज है। देश कौन चला रहा है और कैसे चलता है इसे आप उपरोक्त आनकोडो से ही समझ जाए।  इस पुरे खेल में किसान कहा है ? चुनावी राजनीति के अलावा किसान किस तंत्र में फिट बैठ रहा है जहां से राजनितिक तंत्र को लाभ पहुचे ? साफ़ है कि किसानों से लाभ नहीं तो किसान जाए भाड़ में। 
      अब जरा बदहाल किसानों की दुनिया पर एक दस्तक।  देश -विदेश के लोगो में  दिल्ली के जंतर मंतर को देखने की उत्सुकता आज भी बनी हुयी है। लेकिन आजकल जंतर मंतर का धरना स्थल दर्शको को मर्माहित कर देता है।  गले में नरमुंडो की माला पहने तमिलनाडु के किसान आजाद भारत के उस सच का बखान करते नजर आते है जो लोकतंत्र के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं।  पिछले तीन सप्ताह से भूख ,प्यास और कर्ज के जाल में फसे तमिलनाडु के किसान अपनी जान की भीख सरकार से मांग रहे है। लेकिन सरकार को भला इससे क्या मतलब ? धरना पर बैठे किसान चाहे चूहा खाय या सांप इससे मेकिंग इंडिया और साइनिंग इंडिया का कोई लेना देना नहीं। कह सकते है कि अपने हक और हकूक की लड़ाई कितनी मुश्किल होती है इसकी बानगी है दिल्ली के जंतर मंतर पर तमिलनाडु के किसानों का धरना। चुनावी राजनीति में किसानों को सबकुछ देने का वादा करने वाली तमाम राजनितिक दलों का पोल खोल रही है ये धरना।  लोकतंत्र के चारो स्तम्भ को चुनौती दे रही है किसानों की कातर  निगाहें।  लोकतंत्र को शर्मशार कर रही है उनकी बेबसी। 
 जिन नरमुंडों को देखकर एक आम इंसान डर जाता है, जंतर-मंतर पर ये किसान उन्हें अपने गले में माला बनाकर पहनने को मजबूर हैं।  किसानों ने बताया कि ये नरमुंड उनके हैं जिन्होंने किसानी से मिले ग़म कि वजह से मौत को गले लगा लिया।  किसानों का दावा है कि बीते दो सालों से तमिलानाडु सूखे से जूझ रहा है और पिछले साल का सूखा बीते 140 सालों का सबसे भयानक सूखा था। धरने की अगुवाई कर रहे  है। अयाकन्नु कहते है  कि कावेरी नदी का पानी भी काफी कम हो गया है।  एक दौर था जब वहां के किसान कावेरी के पानी से 29 लाख एकड़ की खेती कर लेते थे लेकिन अब कावेरी के पानी से एक एकड़ की खेती करना भी मुश्किल है।  अब हाल ये है कि अगर तमिलनाडु में 100 कुएं होंगे तो उनमें से 99 सूखे पड़े हैं। धरना स्थल पर आये किसानों का कहना है की सरकारी आंकड़े चाहे जो भी कहे पिछले  ६ महीने में 400 से ज्यादा किसानों ने अपनी जान गावै है।  सरकार की रूचि अब किसानों में नहीं रही।  राजनितिक दल हमें किसी कॉमोडिटी की तरह उपयोग करते है और काम निकलते ही हमें फेक देते है। 
     
किसान नेता  अयाकन्नु  कहते है कि पिछले साल उन्होंने जब सूखे कि स्थिति को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात की थी तब उन्होंने मंत्री जी से कहा था कि नौबत यहां तक आ गई है कि बैंक किसानों की ज़मीन तक बेचने को तैयार है।  अगर किसान की ज़मीन चली जाएगी तो उसके पास जान देने के अलावा क्या चारा रह जाएगा।  जेटली ने उन्हें मदद का भरोसा दिया था। लेकिन अब सरकार को हमसे क्या मतलब।  
           किसानों की मांगे है  उनमें नदियों को जोड़ना भी शामिल है।  किसानों का कर्जा माफी, कावेरी वॉटर मैनेजमेंट बोर्ड, 60 साल के ऊपर के किसानों को हर महीने 5000 रुपए की पेंशन शामिल हैं।  अयाकन्नु कहते हैं कि सरकार अगर कॉर्पोरेट्स का हज़ारों-करोड़ों रुपए का कर्जा माफ कर सकती है तो किसानों के साथ ऐसा करने में क्या परेशानी है।  उनका कहना है कि कॉरपोरेट लोन में जितनी रकम माफ की जाती है अगर वैसी रकम का इस्तेमाल नदियों को जोड़ने में किया जाए तो यूपी, बिहार, ओडिशा, तेलंगाना जैसे राज्यों में आने वाली बाढ़ को रोका जा सकता है और जिन राज्यों में सूखा पड़ता है उन्हें पानी मुहैया कराया जा सकता है। 
    गजब का लोकतंत्र है हमारे देश में ! किसानों की इस दर्दनाक चीख को सुनने के लिए विरोधी पक्ष के नेता जरूर पहुच रहे है लेकिन उनकी आवाज भी सरकार के कानो तक नहीं पहुच रही है।  देश का मीडिया भी किसान की इस परेशानी को आगे बढ़ाने में कोई रूचि  नहीं रखती। ऐसे में गीत गाते रहे और लोकतंत्र जिंदाबाद और हिन्दू धर्म सबसे महान।  

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