Wednesday, April 5, 2017

सन्दर्भ चंपारण सत्याग्रह --राजकुमार शुक्ल ने गांधी को लाया ,बत्तख मियाँ ने गांधी को बचाया


अखिलेश अखिल 

चंपारण आन्दोलन के 100 बरस। बिहार सरकार और केंद्र सरकार मिलकर गांधी के इस आंदोलन को जन जन तक पहुचाने में लगी है ताकि आजादी के बाद की पीढ़ी यह जान और समझ सके कि एक दुबला ,पतला अधनंगा फ़क़ीर जैसा आदमी किस तरह केवल सत्य और अहिंसा के दम पर जालिम अंग्रेजो के गुलामी से देश को कैसे आजाद कराया। रंग भेद और दमन के खिलाफ दक्षिण अफ्रिका में कुछ आंदोलन करने के बाद जब गांधी जी अपने गृह देश भारत लौटे तो यहाँ सब कुछ अटपटा ही उन्हें लगा था।  गोपाल कृष्ण गोखले  को गांधी जी अपना गुरु मानते थे।  गोखले ने उनसे कहा था कि उसे भारत में रहकर पहले भारत को समझना जरुरी है।  गाँव ,किसान ,मजदूर और आम जनो में की परेशानी को समझे बगैर आगे कोई भी कदम उठाना ठीक नहीं।  गांधी जी गोखले की सलाह को मानते हुए भारत की कथा -व्यथा को देखने लगे। इस दौरान उन्होंने कई सत्याग्रह भी किये ,चर्चित हुए लेकिन चंपारण ने गांधी की राजनीति को शिखर पर पहुचा दिया।  गांधी इसी चंपारण में आकर महात्मा बन गए। कह सकते है कि गाँधी की  चंपारण की यात्रा में ही आजाद भारत के सपनो की नींब पड़ गयी थी। 
        चंपारण, नील की खेती के लिए ही  बदनाम नहीं था। नील की खेती करने वाले  किसान, मजदूरों की दर्दनाक शोषण और अंग्रेजो की लंपटता की दास्ताँ देश के कोने कोने में पहुच रही थी लेकिन इसका विरोध कौन करे ? एक से बढ़कर एक नेता तब भी बिहार और देश की धरती पर बिराजमान थे लेकिन अंग्रेजों की नीति के सामने सब के सब बेदम और बेकार सावित हो रहे थे। हिम्मत करके चंपारण के ही किसान पंडित राजकुमार शुक्ल गांधी से कई दफा मिलते है और चंपारण आने का आग्रह करते है। शुरुआत की मुलाक़ात में तो गांधी जी भी राजकुमार शुक्ल को ज्यादा भाव नहीं देते दीखते लेकिन धून के पक्के और जालिम अंग्रेजो के दमन से आजिज शुक्ल जी गांधी से बार बार चंपारण आने याचना करते दीखते है।  और सच यही है कि गांधी 10 अप्रैल 1917 को मुजफ्फरपुर पहुचते है।  फिर क्या था।  गांधी के बिहार आगमन की सूचना  पुरे बिहार के लोगो ,किसानों ,मजदूरो और खासकर निलहे किसानों को स्पंदित कर देता है।  जो जहां थे गांधी की तरफ बढ़ चलते है। 
        गाँधी जी चंपारण पहुचते है।  लाखो की भीड़ देखकर गांधी आश्चर्यचकित नहीं थे , किसानों की दशा ,नंग धरंग  चेहरे और जवानी में ही बूढ़े हो चले लोगो की तस्वीर देखकर गांधी विषमित हो गए थे। गांधी को सत्य का दर्शन यही हुआ था।  गांधी को अंग्रेजो की कुटिलता और अमानवीयता का असली दर्शन चंपारण के लोगो की दशा -दुर्दशा देख कर ही लगा था। चंपारण आंदोलन के ३० बरस बाद देश को आजादी मिली थी।  चंपारण आंदोलन में गांधी के शागिर्द हुए बहुतेरे नेताओ को आजाद भारत में बहुत कुछ सेवा भाव करने का मौक़ा भी मिला।  लेकिन गांधी को चंपारण लाने वाले पंडित राजकुमार शुक्ल को किसी ने याद तक नहीं किया।  ना गांधी जी ने ना इस देश की सरकार ने और ना ही बिहार के नेताओ ने ही। चंपारण का धन्य वह सतवरिया गाव जिसने राजकुमार शुक्ल को जन्म दिया। 
       महात्मा गांधी को चंपारण लाकर राष्ट्रीय राजनीतिक चेहरा बनाने में अगर पंडित राजकुमार शुक्ल की भूमिका है तो चंपारण आंदोलन को गति दिलाने में बत्तख मियाँ की भूमिका को कैसे भुला जा सकता है ? बत्तख मियाँ नहीं होते तो गांधी नहीं होते और गांधी नहीं होते तो निलहे किसानों को आजादी नहीं मिलती और ना ही आजादी की लड़ाई को गांधी आगे बढ़ा पाते। गांधी के चंपारण पहुचते ही अंग्रेजो ने गांधी की हत्या की योजना बना ली थी।  पूर्वी चंपारण के सिसवा अजगरी गाव के रहने वाले बत्तख मियाँ तब दूध बेचकर परिवार को पालते थे।  अंग्रेजो ने बत्तख मियाँ को धन ,पद और डर दिखाकर दूध में जहर मिलाकर गांधी को पिलाने के लिए भेजा था।  बत्तख  मियाँ ने अपने हाथों ही दूध में जहर मिलाया था।  लेकिन बत्तख के खून में राष्ट्रवाद था , निरंकुश अंग्रेजो की गुलामी की बेड़ियो से वह भी छटपटा रहे थे और ऊपर से चंपारण के निलहे किसानों की दशा से खुद भी मर्माहित बत्तख मियाँ  दूध लेकर गांधी के पास पहुच भी गए लेकिन उन्हें बता दिया कि दूध में जहर है।  गांधी मौत की मुंह से लौट चुके थे। 
       लेकिन अंग्रेजो ने बत्तख मियाँ के साथ क्या किया इसकी किसको परवाह ? अंग्रेजों ने बत्तख मियाँ के घर परिवार को लगभग बर्बाद ही कर दिया।  उसके घर को शमशान में बदल दिया और घर के एक एक सदस्य को आर्थिक और शारीरिक दंड से तोड़ ही दिया।  लेकिन बत्तख मियाँ को अपने देश और अपने किये पर नाज था।  वे सबकुछ गवांकर भी गांधी को बचा ले गए थे। अंग्रेजो के डर से अंत में बत्तख मियाँ अपने परिवार को लेकर विस्थापित हुए पश्चमी चंपारण के अकवा परसौनी गांव बस गए।  इस गावँ में आज भी बत्तख मियाँ की औलादे मजूरी करती नजर आती है।  चंपारण सत्याग्रह के 100 बरस पर सरकार से एक ही सवाल है कि गांधी की याद में अगर यह जलसा हो रहा है तो हमें सबसे पहले बत्तख मियाँ और पंडित राजकुमार शुक्ल की याद को ताजा कर उनके परिजनों ,उनकी यादो और उनकी कृतित्व को आगे बढाए।  यही होगा चंपारण सत्यागृह के १०० बरस की याद में इन दो पूज्य महात्माओ को श्रधांजलि। 

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