Monday, April 17, 2017

बीजेपी की भुवनेश्वर बैठक की असली कूटनीति


अखिलेश अखिल 

भुवनेश्वर में बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक करने के कई मायने हैं।  एक माने तो यह है कि  यहाँ की नवीन  पटनायक सरकार अब अपना आभा खो चुकी है।  अब पहले वाली बात नहीं रही।  17 साल से राज्य की कमान सम्हाल रहे नवीन अब विपक्ष से ज्यादा अपनी ही पार्टी के निशाने पर है  और विल्कुल असहाय हो चुके है।  बीजेपी को इसी कमजोरी का लाभ उठाना है।  इस लाभ के पीछे के भी कारण है।  अभी हाल में ही निकाय चुनाव में जिस तरह बीजेपी की भारी जीत हुयी है उससे उत्साहित बीजेपी को लग गया है कि वह नवीन सरकार को पलट सकती है।  बीजद की राजनीति को ध्वस्त कर सकती है।  बीजेपी को पता है कि विपक्षी कांग्रेस की हालत और भी ख़राब है।  बीजेपी ने भुवनेश्वर  में बैठक का मंच इसलिए भी तैयार किया है कि  उसे इस तटीय राज्य के सहारे बंगाल की राजनीति में भी दखल देना है।  बीजेपी को पता है की जिस तरह बंगाल में लगातार उसके वोट बैंक बढ़ रहे है ,आने वाले दिनों में बीजेपी वहा सत्ता में पहुंच सकती है इसलिए भुवनेश्वर के जरिये बंगाल को भी साधने की राजनीति है।  फिर बीजेपी को झारखण्ड की राजनीति पर भी नजर रखनी है।  इस बैठक में यह भी तय हो जाएगा की झारखण्ड में रघुबर दास को बदला जाय या नहीं।  रघुबर सरकार की नीति और जनता के बीच उनकी छवि से केंद्र नाखुश है।  ऐसे में बड़ी संभावना है की कुछ महीनो में रघुबर को हटाकर किसी काम करने वाले नेता को बागडोर सौंपा जाए। और चौथी बात यह है कि इस बैठक में 2019  की नीति और रणनीति तैयार होनी है साथ ही यह भी तय होना है कि अगर बीजेपी को विरोध में विपक्ष कोई संयुक्त मोर्चा तैयार करता है तब बीजेपी की राजनीति क्या होगी ?
      ओडिशा निकाय चुनावों में हार के बाद नवीन पटनायक ने कहा था कि वो पार्टी के सभी पुराने नेताओं के साथ बैठकर आत्ममंथन करेंगे और मुमकिन तौर पर सरकार में फेरबदल भी करेंगे।   लेकिन नवीन पटनायक के पास पार्टी के लिए शायद ज्यादा वक़्त नही था।  उधर मुख्यमंत्री की बेरुखी से कुंठित नेता अब  बीजेडी के गिरते ग्राफ और पटनायक की हाल की नाकामियों को देखकर बीजेपी से गलबहियां कर रहे हैं।  जानकार कह रहे हैं कि 2019 आते आते जब ओडिशा में लोकसभा चुनाव के साथ विधान सभा चुनाव भी होंगे तो यूपी जैसी तस्वीर यहां भी देखने को मिल सकती है।  यानी बीजेडी के कई ‘स्वामी प्रसाद मौर्या’ अपने मालिक मुख्तार को ठेंगा दिखाकर ऐनवक्त पर भगवा धारण कर सकते हैं।   शायद धर्मेन्द्र प्रधान को भी ऐसी ही उम्मीद है...और क्यूं न हो जब शत्रु खेमे में घर के चिराग ही खुद बुझते नज़र आ रहे हों। 
       साफ़ है कि बीजद की कमजोर राजनीति को भांपते हुए बीजेपी ने अगले चुनाव में यहाँ बड़ा दाव  खेलने की रणनीति तैयार की है। माना जा रहा है कि दर्जन भर से ज्यादा बीजद विधायक बीजेपी में जाने को तैयार है और ऐसा हो गया तो बीजेपी की राजनीति सफल हो जायेगी। 

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