Sunday, June 4, 2017

और सरकारी दलाली से ही नेताओं की समृद्धि बढ़ी


अखिलेश अखिल 
फिर 15  अगस्त आने वाला है। लाल किला के प्राचीर से फिर हमारे प्रधानमन्त्री देश को सम्बोधित करेंगे और 21 सदी में भारत को किस मुकाम पर ले जाना है उसका आगाज भी करेंगे। पिछले 70 साल से ऐसा ही हो रहा है।  हर 15 अगस्त को हमारे प्रधानमन्त्री बोलते रहे हैं कि हमने ये किया ,हमने वो किया और भारत विकास के रास्ते पर दौर गया है। लेकिन भारत को दौरते हुए इस देश ने कभी नहीं देखा। इस देश की गरीब ,बेहाल और फटेहाल जनता ने कभी महसूस नहीं किया कि हम किसी देश में भी रहते है और देश की सरकार हमारे लिए भी कुछ करती दिखती है। 70  सालों में से करीब 50 साल तो अधिकतर जनता कटोरा लिए सड़क पर खड़ी थी।  सरकार ने कोटा प्रणाली के जरिये जनता को भीख देती रही और जनता मस्त रही। आम जनता को पिछले 50 साल में कुछ भी नहीं मिला। लेकिन उधर जनता के नाम पर नेता और नौकरशाह देश को लुटते रहे।  ऐसी लूट कि नादिरशाह भी लज्जित हो जाता।   90 के बाद लागू आर्थिक नीति ने देश के एक वर्ग को ज़िंदा कर दिया। पहले केवल नेता और नौकरशाह कमाई की ज्यादा रकम को बाँट रहे थे अब कॉर्पोरेट और दलाल वर्ग भी उस लूट में शामिल हो गए।  पिछले 25 साल में नै आर्थिक निति के नाम पर भले ही देश की जनता की हालत नहीं बदली हो लेकिन देखते देखते करोड़पतियों की आवादी देश में बढ़ती चली गयी। सच यही है कि हमारी देश की पूरी आर्थिक और राजनितिक नीति अब तक लूटतंत्र पर ही टिकी रही। 70 साल की सरकारों से कौन पूछने जाए कि दुनिया के देशों से भारत को जो कर्ज मिले वे कहा चले गए ? क्या उन कर्जों का गरीबी हटाने ,शिक्षा बढ़ाने और स्वस्थ्य ठीक करने के लिए खर्च किया गया ? और अगर किया गया तो हमारी हालत क्यों नहीं बदली ? नेता कर नौकरशाहों ने देश को कही का नहीं छोड़ा। पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत को लेकर जो टिप्पणी की है उसके बारे में सोचने की जरुरत है। 
  जिस देश में ‘समृद्ध’ नेताओं की कमाई सरकारी दलाली पर निर्भर हो, जहाँ नौकरशाह रिश्वतखोर और उद्योगपति कर-चोर हों, उस देश के बारे में अगर डोनाल्ड ट्रम्प ये कहें कि भारत अरबों डालरों के दान और ग्रांट का भूखा है तो बुरा तो बहुत लगता है लेकिन ट्रम्प की बात गलत नही है।  ट्रम्प मुहंफट हैं, बेधडक हैं, इसलिए किसी अबूझ या कुभाषी की तरह अक्सर नंगा सच बोल जाते हैं।  उन्होंने पेरिस की पर्यावरण संधि के संदर्भ में कहा कि भारत को विकसित देशों से सिर्फ अरबो-खरबों की ग्रांट चाहिए।  भले ही भारत अपने यहाँ प्रदूषण कम करे या ना करे लेकिन खरबों डालर की ग्रांट पर उसकी निगाह है। 
ट्रम्प के इस भारत विरोधी बयान की निंदा होनी चाहिए लेकिन इस ग्रांट का बड़ा हिस्सा लूटने वाले नेता-नौकरशाह-उद्योगपतियों पर हम पर्दा क्यूँ डालें? आखिर कब तक महाशक्ति का सपना देखना वाला ये देश अंतर्राष्ट्रीय सहायता और दान के लिए हाथ पसारेगा?  क्या यही 1.30 अरब भारतीयों का स्वाभिमान है ? 
आज हमारी सारी  नीति पाकिस्तान जैसे लफंगा और दरिद्र देश के इर्द गिर्द घूमती  नजर आती है।  आखिर क्यों ? क्या हमारे पास काम करने के लिए और कुछ नहीं है ? पिछले 27 साल से चली आ रही नयी आर्थिक नीति से भले ही हमारे देश के कुछ लोगों की आमदनी बढ़ गयी हो ,लेकिन कोई बता सकता है कि देश के सबसे पिछड़े प्रदेश बिहार , उत्तरप्रदेश ,झारखण्ड ,ओडिशा ,मध्यप्रदेश से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में कोई विशाल इंडस्ट्री लगाई गयी हो।  50 के  दशक में जो कारखाने लगाए गए थे उसी पर आज भी हम नाज करते फिर रहे हैं।  लेकिन उसके बाद की सरकारें क्या की ? कोई बता सकता है कि देश के हर राज्य के पास कोई टाटा ,बिड़ला जैसे लोग हैं। जो अपने अपने प्रदेश में विकास की गाथा लिख सके।  कदापि नहीं। सरकारी पैसे की लूट और प्राइवेट कंपनियों से वसूली की नीति ही हमारी पहचान बनती गयी है। उद्योग की जगह चिट फंड ,शेयर दलाली ,रियल स्टेट और बिल्ङरी ने ले ली।  ये नए जमाने के नए उद्योग बन गए।  इनमे नेताओं और नौकरशाहों के धन भी शामिल हुए। देश लुटती रही और जनता बेहाल बनती चली गयी।  मोदी सरकार से उम्मीद की जा सकती है कि वे हर प्रदेश को बड़ी बड़ी इंडस्ट्री से लैश करे।  अगर ऐसा संभव हो गया तो भारत सदा उनके याद रखेगा। 
     

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