Sunday, July 9, 2017

नीतीश की राजनीति भरमाती भी है और चौंकाती भी है


अखिलेश अखिल 
लालू प्रसाद के परिजनों पर सीबीआई की छापेमारी ने बिहार और बिहार से बाहर की राजनीतिक  तापमान को बढ़ा दिया है। महागठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े हो रहे हैं। नीतीश की पार्टी जदयू  चुप्पी मारे सारे खेल को देख रही है और आगे की रणनीति बना रही है। सीबीआई छापे पर अभी तक ना ही सीएम नीतीश के कोई बयान आये हैं और ना ही उनकी पार्टी की तरफ से किसी को लालू प्रसाद से मिलने के लिए भेजा गया है।  जदयू नेता रमई राम लालू से जाकर जरूर मिले हैं लेकिन मिलन लालू के साथ लम्बे समय तक रहने के रूप में देखा जा रहा है। अब खबर आयी है कि 10 जुलाई को जहां लालू प्रसाद अपनी पार्टी की बैठक कर आगे की रणनीति की तैयारी करने वाले हैं वही जदयू भी 11 जुलाई को बैठक कर आगे की रणनीति का खुलासा करेंगे। बैठकों की यही राजनीति बिहार वासियों और देश के राजनीतिबाजों को असमंजस में डाले हुए है।     नीतीश  कुमार की राजनीति को भला कौन समझ पाए ? उन्हें ना समझने वाले लोग  तरह तरह के मुहावरों से नितीश को विश्लेषित करते हैं। लेकिन नीतीश को उन विशेषणों से ना कोई लगाव है ना ही दुराव। नीतीश की अपनी चाल है और अपनी राजनीति। यही वजह है कि   नीतीश की राजनीति सबको भरमाती भी है और चौंकाती भी है। नीतीश बिहार को भी चौंकाते हैं और देश को भी। नीतीश की पार्टी की हैसियत चाहे जितनी बड़ी हो लेकिन भारतीय राजनीति में नितीश का चेहरा मामूली नहीं।  वर्तमान राजनीति में नीतीश  एक अनिवार्य चेहरा हैं।  बिहार में आगे की राजनीति  बीजेपी  की रणनीति के मुताविक होगी या नीतीश  के मुताविक इस पर सबकी निगाहें टिकी  है।  लालू नीतीश अगर अलग होते हैं तो बीजेपी की रणनीतिक जीत मानी जायेगी। और नीतीश की रणनीति के मुताविक राजनीति चलेगिओ तो बीजेपी की मात मानी जायेगी।  लेकिन शह  मात की इस राजनीति के असली खिलाड़ी अब नीतीश  ही है। देखना पडेगा कि बिहार कि यह राजनीति देश को क्या सन्देश देती है। 
    सन् 2014 में मोदी लहर पर सवार होकर बीजेपी लगभग हर राज्य को जीतती हुई बढ़ रही थी।  उनकी विजय के अश्वमेध को न सिर्फ बांधने बल्कि यज्ञ को भी भंग करने का श्रेय सिर्फ दो नेताओं को जाता है . दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और बिहार में नीतीश कुमार।  अरविन्द केजरीवाल कभी भी विपक्ष की एकता के प्रतीक नहीं बन सके   लेकिन नीतीश और लालू प्रसाद के बनाए हुए महागठबंधन ने सारे इतिहास तोड़कर नया इतिहास बनाया। लेकिन इस दास्तान को धक्का तब लगा जब राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार ने विपक्षी एकजुटता से अलग हटने का फैसला किया।  काफी हंगामा हुआ, लेकिन नीतीश मुखर होकर सामने आए और विपक्ष को ही आड़े हाथों ले लिया।  जल्दी ही लालू प्रसाद यादव भी सपा—बसपा की एकता का फॉर्मूला यूपी के लिए लेकर आए लेकिन उस फॉर्मूले में नीतीश के लिए कोई जगह उन्होंने नहीं बनाई।
बीते साल भर में कई मौके ऐसे आये हैं जब यह कहा गया कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के बीच सबकुछ ठीक नहीं है।  इन कयासों को तब और बल मिला जब कई मौकों पर नीतीश कुमार ने केंद्र की मोदी सरकार का समर्थन किया।  अब एक बार फिर लालू प्रसाद के परिवार पर सीबीआई और ईडी के छापों के बाद नीतीश-लालू के रिश्तों और महागठबंधन के भविष्य को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं।  लेकिन नीतीश कुमार चुप हैं और उनका ऊंट किस करवट बैठने वाला है ये सिर्फ नीतीश कुमार ही जानते हैं।
          सर्जिकल स्ट्राइक और उरी आतंकी हमले के बाद नीतीश कुमार ने पहली बार खुलकर प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार का समर्थन किया।  जब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने सेना से सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे, तब भी नीतीश प्रधानमंत्री मोदी के साथ ही खड़े दिखे।  मोदी सरकार के सबसे बड़े फैसले नोटबंदी का भी समर्थन नीतीश कुमार ने किया।  उन्होंने काला धन और हवाला के कारोबार पर रोक लगाने के लिए ऐसे सख्त फैसले लेने पर पीएम मोदी की खुलकर तारीफ भी की।  नीतीश कुमार ने पीएम मोदी के साथ पटना में गुरू गोविन्द सिंह जी के 350वें प्रकाशोत्सव पर भी मंच साझा किया था। 2015 में जदयू, राजद और कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाया था।  इस महागठबंधन की खूबी यही थी कि इसमें बिहार की सियासत के दो धुर विरोधी पहली बार एक मंच पर आए थे।  इस राजनीतिक चाल ने भाजपा को भी बुरी तरह चौंका दिया था।  राजद इस चुनाव में 80 सीटें जीतकर आई थी, जबकि जदयू को 71 सीटें मिली थीं. बीजेपी 157 सीटों में से सिर्फ 53 सीटें ही जीत सकी थी।  जबकि एनडीए ने 224 सीटों में से सिर्फ 58 सीटें ही जीती थीं।  जबकि महागठबंधन के पास 178 सीटों का प्रचंड जनादेश है। नीतीश ने विपक्ष के फैसले से एक बार फिर कन्नी तब काट ली जब उन्होंने बीजेपी के राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविन्द को समर्थन देने का फैसला लिया।  खूब हल्ला गुल्ला मचने के बाद भी नीतीश ने अपना फैसला नहीं बदला।  राजद नेताओं और मुखिया लालू प्रसाद यादव के अलावा कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद की आलोचना के बाद भी नीतीश अपने फैसले पर टिके रहे।  लेकिन नीतीश ने साफ भी किया कि हो सकता है कि वह उप—राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष के उम्मीदवार को वोट करें।  पाला बदलकर खेलने की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इस नीति को समझना बिहार की राजनीति के पण्डितों के लिए भी आसान नहीं है। 
     और अब अंतिम कहानी ये बनती हैं कि क्या नीतीश कुमार नैतिकता के आधार पर लालू पुत्रों से इस्तीफा लेंगे ? अगर इस्तीफा की राजनीति चलेगी तो क्या लालू प्रसाद ऐसा मान जाएंगे ? क्योंकि लालू के लोग कह रहे हैं कि जब उमा भारती और आडवाणी पर मुकदमा होने के बाद भी मंत्री और सांसद के पद पर बने रहना नैतिकता है तो फिर लालू पुत्र इस्तीफा क्यों देंगे ? सवाल यह भी है कि इस बेनामी संपत्ति की राजनीति  नीतीश लालू से अलग होकर बीजेपी के साथ चले जाएंगे ? सवाल कई और हो सकते हैं ? तो जबाब  भी कुछ इसी तरह से कई तरह के हो सकते हैं। अगर सारी बातों को छोड़ भी दिया जाय तो अहम् सवाल यह है कि क्या नीतीश  कुमार की सीएम कुर्सी पर कोई खतरा है ? और क्या बीजेपी के साथ जाकर नीतीश कुमार सीएम के अलावा कुछ और बन जाएंगे ? हां इसमें बीजेपी को लाभ जरूर हो जाएगा।  राजनीतिक हलकों में हर कोई जानता है कि नीतीश कुमार परोक्ष रूप से ही सही पीएम के उम्मीदवार है और मोदी को वे चुनौती देने का मादा रखते हैं।  अगर जदयू बड़ी पार्टी होती तो खेल कुछ और ही होता। ऐसे में सीबीआई छापा को लेकर नितीश महागठबंधन के साथ छेड़छाड़ करते हैं तो साफ़ है कि बीजेपी की रणनीतिक जीत होगी और नीतीश की राजनीति कमजोर हो जायेगी।  बीजेपी को नीतीश के चेहरे का डर है।  वह नीतीश को अपने पाले में लाकर भविष्य की चुनौती को मात देने में लगी है। फिलहाल देखना होगा कि नीतीश अपनी पार्टी की बैठक में कहा तक निर्णय लेंगे ?

No comments:

Post a Comment