Thursday, December 28, 2017

सीबीआई -साख पर बट्टा और राजनितिक गुलामी

अखिलेश अखिल 
देश के सत्ताधारी दलों ने अब तक जितना सीबीआई का दुरुपयोग अपने विरोधियों को डराने में किया होगा, शायद किसी और संस्था का नहीं। तभी तो उसे कई बार कई नामों से बुलाया जाता रहा। यहां तक की सरकारी तोता तक कहा गया। हाल ही में 2 जी घोटाला, जिसे अब घोटाला नहीं कहा गया, में सीबीआई की साख को बट्टा लगा है। सच तो यह है कि इससे पेसों के साथ-साथ सीबीआई की साख पर सवाल उठा है और बडे पैमाने पर आर्थिक नुकसान भी। कई बडे बडे चर्चित केस जिससे देश की जनता जहां एक ओर गुमराह हुई है, वहीं विरोधी इसका लाभ उठाने में कामयाब रहे हैं। यहां पर अधिक केसों का जिक्र करना मुनासिब नहीं है, क्योंकि बहुत से पुराने सीबीआई केसों से संबंधित लोग अब नहीं हैं, लेकिन सीबीआई तो है। 
जहां तक सीबीआई का वाल है, उसके अधिकांश बडे केस बवंडर की तरह आए और अपने अंजाम तक पहुंचते पहुंचते फुस्स हो गए। परंतु जिन लोगों को सीबीआई का दंश झेलना पडा और नुकसान उठाना पडा उनका क्या ? अभी हाल ही में सीबीआई के कुछ प्रकरणों पर प्रकाश डालना आवश्यक है। आवश्यक इसलिए कि भविष्य में कहीं सीबीआई का औचित्य ही खत्म न हो जाए ? पहला तो आरुषि मर्डर केस जिसमें सीबीआई असली कातिल तक तो नहीं पहुंच पाई, परंतु उसके मां-बाप पर मर्डर मिस्ट्ी का पूरा श्रेय उडेल दिया और कुछ वर्षों उपरांत नतीजे के रूप में जमानत पर रिहा हुए। सीबीआई अपना पक्ष स्पष्ट रूप से नहीं रख पाई। यदि आरुषि मर्डर के सीबीआई के अभियुक्त यदि कोर्ट से बरी हो जाते हैं, तो उनकी इज्जत या साख पर क्यों बट्टा लगा है, इसकी भरपाई कैसे होगी? इसके लिए कोर्ट या हमारी व्यवस्था उनको कौन सी सजा देगी। यह भी सुनिश्चित होना चाहिए। आरूषि तो चली गई। परंतु जिसकी इकलौती औलाद गई, वह मातम भी नहीं मना सके। वाह री सीबीआई। 
हम कुछ भी कह सुन लें, इससे देश के सत्ता लोलुपों पर असर नहीं पडने वाला है। उनको तो सत्ता प्राप्ति से मतलब है। सत्ता मिल गई, सभी वसूलें दरकिनार हो गए। 
सीबीआई की विशेष अदालत के न्यायाधीश  ओपी सैनी द्वारा पर्याप्त सबूतों के आभाव में 2-जी घोटाले के सभी अभियुक्तों को बाइज्जत बरी कर दिया। इसके बाद तो जैसे भारतीय राजनीति में कोहराम मच गया है। डीएमके ने तमिलनाडु में दीपावली सरीखा जश्न मना डाला और कांग्रेस पार्टी के लीडर भी खुशी से झूमने लगे हैं। जबकि सर्वविदित है कि 2-जी घोटाले का अंतिम निर्णय कदाचित नहीं आया है और अभी तो हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट द्वारा अपीलों को सुनना और परखना शेष है। जयललिता और शशिकला पर भ्रष्टाचार केस पर निर्णय देते हुए हाईकोर्ट द्वारा उनको बरी कर दिया गया था, किंतु सर्वोच्च अदालत द्वारा दोषी करार दिया गया। हांलाकि अंतिम फैसला आने से पूर्व ही जयललिता का अंतकाल हो गया था। उनकी निकट सहयोगी रही शशिकला आजकल कारावास भुगत रही है। इसलिए 2-जी घोटाले में सीबीआई कोर्ट द्वारा अभियुक्तों के बरी किए जाने पर जश्न मनाने का कोई ठोस कारण नहीं है। इस घोटाले का पर्दाफाश करने वाले विनोद राय के विरुद्ध जश्न में डूबे कांग्रेसियों ने संसद के अंदर और बाहर हल्ला बोल दिया है। क्योंकि वर्ष 2011 में 2-जी घोटाला कांड का पर्दाफाश तत्कालीन कंपोट्रोलर और ऑडिटर जनरल विनोद राय द्वारा किया गया था। अत्यंत कर्मठ, बेहद ईमानदार और निष्ठावान आईएएस अधिकारी की छवि से ओतप्रोत रहे विनोद राय पर कांग्रेस और सपा बिफर पड़े हैं।
हाल ही में कोर्ट द्वारा सबसे बडे घोटाले पर आए निर्णय ने देश को हिला कर रख दियाह ै। यह कैसे संभव है कि यूपीए सरकार के रहते जो घोटाला सामनो आया आज एनडीए के शासन में वह घोटाला हुआ ही नहीं ? क्या सीएजी की रिपोर्ट में कोई दम नहीं था ? या कहानी कुछ और बुन दी गई ? सवाल एक नहीं, कई हैं। अब सवाल सीबीआई पर उठता है कि जांच उसकी, जज उसका फिर भी नतीजा जीरो। कितनी हास्यास्पद स्थिति है। अब तक जो जांच में समय और धन की बर्बादी हुई, उसका जिम्मेदार कौन ?
समाजवादी पार्टी ने तो विनोद राय को संसद में तलब करने की मांग पेश कर दी है। उल्लेखनीय है कि विनोद राय वर्तमान में बीसीसीआई के चैयरपर्सन, केरल इंफ्रास्ट्रचर एंड इनवेस्टेमेंट बोर्डके अध्यक्ष, बैंक बोर्ड ब्यूरो के भी चैयरमैन हैं। किंतु इनमें से कोई पद नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा प्रदान नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा विनोद राय को बीसीसीआई का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। केरल सरकार द्वारा केआईआईबी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। सीबीआई अदालत द्वारा 2-जी घोटाले में सीबीआई पर ही नकारात्मक टिप्पणी की है, किंतु विनोद राय के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं लिखा गया है। फिर कांग्रेस किस कारणवश विनोद राय के विरुद्ध आक्रमक है।

कांग्रेस पार्टी का चरित्र भ्रष्टाचार के दलदल में पंडित नेहरु शासनकाल से ही था। तब जीप स्कैंडल और मूंदणा कांड उजागर हुए। फिर इंदिरा गांधी की हुकूमत में नागरवाला कांड, राजीव गांधी की सरकार में बाफोर्स घोटाला, नरसिम्हा राव का यूरिया घोटाला और मनमोहन सिंह हुकूमत में तो घोटालों का रिकार्ड कायम हुआ। भ्रष्टचारी सरकारों में शानदार और ईमानदार अधिकारियों की दुर्गति हुई है, उसके जीवंत उदाहरण गोविंद राघव खैरनार, अशोक खेमका सरीखे अनेक अधिकारी रहे हैं। कांग्रेस अब भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले विनोद राय पर हल्ला बोलकर आखिकार क्या सिद्ध करना चाहती हहै। क्या कांग्रेसी हल्लाबोल कारनामों से ईमानदार अधिकारियों का मनोबल तोड़ सकेंगें। जिन्होने अपने व्यक्तिगत सुख-दुख और मलाईदार पोस्टिंग्स की कतई परवाह न करते हुए सदैव अपना संवैधानिक फर्ज अदा किया है। आखिरकार ऐसे ही अनेक ईमानदार और कर्मठ अधिकारियों के दमखम पर ही भारतीय प्रशासन की साख अभी तक बची हुई है।
जरा पीछे चलते हैं। चंद दिन पहले। सीबीआई की साख एक बार फिर दांव पर है। सुप्रीम कोर्ट ने कोयला घोटाले के आरोपियों से साठ-गांठ रखने के आरोप में सीबीआई के पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा के खिलाफ एसआईटी जांच के आदेश दिए हैं। सर्वोच्च अदालत ने स्वीकार किया है कि इस मामले में सिन्हा ने अपने पद का दुरुपयोग किया। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई के पूर्व विशेष निदेशक एमएल शर्मा की अध्यक्षता वाली समिति की जांच में प्रथमदृष्टड्ढया पाया गया है कि सिन्हा ने कोयला घोटाले की जांच को कथित तौर पर प्रभावित करने का प्रयास किया था। कोर्ट ने यह आदेश वरिष्ठड्ढ वकील प्रशांत भूषण की याचिका पर दिया है। सवाल यह है कि सीबीआई जैसी उच्च संस्था के एक निदेशक ने ऐसा क्यों किया? क्या यह काम तत्कालीन यूपीए सरकार के निर्देश पर किया गया? क्या निदेशक के अपने कोई निजी हित थे? क्या रंजीत सिन्हा को मालूम नहीं था कि वे मुल्जिम को पकडने के बजाय उसकी मदद कर कानून और संविधान दोनों की मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हैं? क्या सीबीआई केंद्र सरकार का तोता है और वह वही बोलता है जो उसका मालिक चाहता है? क्या विपक्ष के इन आरोपों को मान लिया जाए कि सीबीआई का केंद्र सरकार दुरुपयोग करती है? दरअसल, यह घोटाला तब सुर्खियों में आया जब कैग ने मार्च 2012 में अपनी रिपोर्ट पेश की। कैग ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन यूपीए सरकार पर आरोप लगाया था कि उसने 2004 से 2009 तक की अवधि में कोयला ब्लॉक आवंटन गलत तरीके से किया। कई फर्मों को बिना किसी नीलामी के कोयला ब्लॉक आवंटित किए गए। इससे देश को करीब 1.86 लाख करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ। उस समय भाजपा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस्तीफे की मांग की थी। इसके बाद सीबीआई को जांच सौंपी गई। इस मामले में एक दर्जन कंपनियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा किए गए 200 से ज्यादा कोल ब्लॉक आवंटन 2014 में रद कर दिए थे। इस दौरान सीबीआई के तत्कालीन निदेशक रंजीत सिन्हा पर आरोपियों से साठगांठ का आरोप लगाया गया। प्रथमदृष्टड्ढया आरोप सिद्ध भी हो चुके हैं लेकिन अभी यह साफ नहीं हो सका है कि सिन्हा के ऐसा करने की असली वजह क्या थी। असली वजह तो जांच के बाद ही पता चल सकेगी, लेकिन संस्था के निदेशक के इस कार्य ने उसकी साख पर बट्टड्ढा लगा दिया है। यदि यह सब सरकार के निर्देश पर किया गया है तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद घातक है और इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो इस संस्था की निष्पक्षता से आम आदमी का विश्वास उठ जाएगा।
अब सवाल यह भी है कि आखिर जनता ने यह सोच बनाई ही क्यों है कि सीबीआई जांच से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा ? यहां पर एक और प्रकरण का जिक्र करना चाहूंगा। हाल ही में मुंबई में भारत सरकार की एक नोडल एजेंसी को भारत सरकार ने कोई निर्माण का कार्य दिया हैं। जिसे नोडल एजेंसी ने तयशुदा प्रक्रियाओं के तहत देश की नामी-गिरामी शापुर जी पालन जी को दे दिया। अब निर्माण से संबंधित नोडल एजेंसी शापुर जी पालन जी जिम्मेदार है वह यह काम खुद करती है या किसी और से करवाती है। यह शापुर जी की जिम्मेदारी है। इसमें वह किस टर्म और कंडीशन पर किसको कार्य करने का सौंप रही है, वह इस कार्य को तय समय के अंदर कैसे पूरा करेगी, उसका काम है। लेकिन सीबीआई का उतावलापन देखिए, वह मुंबई जाकर वार्ता करने वालों को गिरफतार करके बकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी करती है कि हम 120बी अपराधिक षडयंत्र के तहत मामले की प्रथम दृष्टया रिपोर्ट दर्ज करते हैं। यहां हास्यास्पद स्थिति यह है कि इसमें नोडल एजेंसी के सीएमडी का नाम भी दर्ज होता है, जिसका इस प्रकरण से कुछ लेना देना नहीं है। और यदि होगा भी तो वह वहां पर उपस्थित नहीं थे। यहां पर इसकी चर्चा करना इसलिए आवश्यक है कि मान लिया जाए कि जिन व्यक्तियों का नाम इसमें शुमार है, कल यदि सीबीआई का हाथ खाली रहा और इनका सामाजिक आर्थिक एंव व्यक्तिगत नुकसान होता है, तो इसकी भरपाई कौन करेगा ? इसके पीछे कहीं साजिश तो नहीं ? यदि हां, तो वह साजिशकर्ता कौन है, इसे समझने की आवश्यकता है।
गीता मित्तल मुख्य न्यायाधीश दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 जुलाई 2017 रिट संख्या 12313/2015 में सीबीआई को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता के संज्ञान में आप इसकी जांच करें एवं हर माह कोर्ट को भी प्रगति की स ूचना दें। साथ ही याचिकाकर्ता से जहां भी आवश्यकता हेा, वहां सलाह लें। परंतु देश के सबसे बडे घोटाले की जांच करना ही नहीं चाहती है और अपनी दलील से साबित करना चाहती है कि उक्त जांच को दिल्ली पुलिस करें, जिसे लेकर सीबीआई सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही ळै। 
उक्त घोटाले से सस्पेंस हटाते हुए कहा जा रहा है कि यह घोटाला डीजीआर डायरेक्टर जनरल रि सेटलमेंट से संबंधित है। यहां पर पूर्व जवानों के साथ अच्छा मजाक किया गया हैं इसमें शामिल लोगों को बचाने में कोई कोर कसर सीबीआई नहीं छोडना चाहती है। ऐसा नही ंहै कि यह पहली बार हुआ है। इससे पूर्व भी रिट संख्या 5578/2013 में भी हाई कोर्ट द्वारा सीबीआई को जांच करने का आदेश दिया गया था। लेकिन सीबीआई ने उक्त केस में ऐसी लीपापोती किया कि घोटाले को ही खत्म कर दिया गया, जबकि डीजीआर घोटाला देश का सबसे बडा घोटाला साबित होने जा रहा है। 2 जी तो हवा हो गया है, परंतु जो घोटाला वास्तव में साबित होगा, उसकी जांच सीबीआई करना ही नहीं चाहती है, क्योंकि इसका मीडिया ट्ायल नहीं हुआ है। 


यह वही सीबीआई है, जिसने अभी कुछ दिनों पूर्व ही एक आईएएस के पूरे परिवार को ही अपना शिकार बना लिया। अब उस परिवार में कोई नाम लेने वाला भी नहीं बचा है। जबकि इस डीजीआर घोटाले के अभियुक्तों के खिलाफ सबूत होने के बावजूद जांच नहीं करने के पीछे का मकसद स्पष्ट नजर आ रहा है। यह अब समझने या समझाने की बात नहीं है। 

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