Wednesday, December 27, 2017



जिरह ,गवाह और फैसलों  के बीच सामंतों के दर्प को तोड़ता 'ललुआ '
अखिलेश अखिल

बिहार का लालू प्रसाद यादव कब ललुआ बन गया भला किसे पता ! किसने लालू को ललुआ बनाया कौन जाने ! लेकिन भदेश ललुआ कब बिहार की राजनीति से बाहर निकल कर राष्ट्रीय राजनीति को नाथने लगा यह तो सब को पता है। 'राजनीति का ठग' कौन है और किसने कितनी बार राजनीति करने के नाम पर जनता की उम्मीदों ,आकांक्षाओं और सपनो को कुचला है ,लोकतंत्र को लुटा है और गरीबो ,अकलियतों ,दलितों ,उपेक्षितों के नाम पर राजनीति को कलंकित किया है यह भला किसी से छुपा नहीं। अगर आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का क्रमबद्ध अध्ययन करें तो साफ़ हो जाता है कि अधिकतर नेतानुमा जिव और अधिकतर राजनितिक पार्टियों जनता के साथ धोखा ही किया है। और इन धोखेबाजों में कोई किसी से कम नहीं। सबके नाम के आगे 'नाम बड़े  और दर्शन छोटे ' जैसी कहावत चरितार्थ साबित होती है। फिर ललुआ के साथ इतना द्वेष क्यों ?
     उसी चारा घोटाले में फसने पर जगन्नाथ मिश्रा 'जगन्नाथ बाबू' बने रहते हैं, पर लालू प्रसाद 'ललुआ' हो जाते हैं। लालू प्रसाद से 'ललुआ' तक की फिसलन भरी यात्रा में लालू प्रसाद की सारथी रही मीडिया का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तो होना चाहिए। बिना डिगे सांप्रदायिकता से जूझने का माद्दा रखने वाले सियासतदां, पत्थर तोड़ने वाली भगवतिया देवी, जयनारायण निषाद, ब्रह्मानंद पासवान और ना जाने कितने दलित ,बंचित और सर्वहारा  आदि को संसद भेजने वाले, खगड़िया स्टेशन पर बीड़ी बनाने वाले विद्यासागर निषाद को मंत्री बनाने वाले एवं आज़ादी के 43 वर्षों के बीत जाने के बाद भी बिहार जैसे पिछड़े सूबे में समाज के बड़े हिस्से के युवाओं को उच्च शिक्षा से जोड़ने हेतु 6 नये विश्वविद्यालय खोलने वाले लोकप्रिय किन्तु  विवादास्पद नेता लालू प्रसाद की सियासत को 1990 से तो देखा ही जा सकता है। भदेश लालू सत्ता के शीर्ष पर बैठते ही जब सामंती बिहार पर नकेल कसने की कोशिश करने लगे और दलित ,पिछड़ों ,अकलियतों की जमात को आगे बढ़ाने लगे बिहार का सामंती मूड बिगड़ गया। लालू प्रसाद ललुआ हो गए। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि सालों से दलित ,पिछड़ों और मुसलमानो की राजनीति की बाते तो सब करते थे लेकिन उन्हें मुख्या धारा में लाने से सब कतराते ही थे।  लालू ने इस रिबाज को तोड़ा और लोकतंत्र को मर्यादित करने के लिए जब पिछड़ों की राजनीति की दुदुम्भी बजाई ,सब विरोधी हो गए। 
  लालू प्रसाद आज भी हिन्दी बेल्ट के उन चंद धुरंधर वक्ताओं की फ़ेहरिस्त में शुमार हैं जिनकी ओरेटरी का कोई ज़ोर नहीं। क्राउड पुलिंग में आज भी उनका कोई मुक़ाबला नहीं। उन्मादी, सांप्रदायिक, विभाजनकारी व राष्ट्रभंजक राजनीति करने वालों के खिलाफ खड़ी होनेवाली लोकतांत्रिक शक्तियों की भूमिका व हमारे संघर्ष में उनके अंशदान को हम नम्रता से स्वीकार करते हैं। जिनके पैर शूद्रों और दलितों को ठोकर मारते थे, उनके दर्प को तोड़ने का काम लालू प्रसाद ने किया।
      लालू के राज में बिहार को क्या मिला ? यह बड़ा सवाल आज भी तैर रहा है। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी जरुरी है की किसके काल में बिहार को क्या मिला ? किसी के पास कोई सार्थक जबाब भी नहीं है। जिस जाति की राजनीति को गोलबंद करके बिहार से लेकर भारत की राजनीति को साधने का काम लालू ने किया ,कहीं देखने को नहीं मिलेगा। वह लालू ही है जिसने सामंतो की घुरकी से दलित ,पिछड़ों और मुसलमानो को निजात दिलाया। हल जोतने वाला ,मजदूरी करने वाला ,जूता बनाने  वाला और ना जाने कौन कौन राजनीति की मुख्य धरा से जुड़ा और लोकतंत्र को मजबूत किया। दुनिया के आधुनिक इतिहास में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता कि एक भदेश ,गवई और देहाती नेता अपनी हुंकार ,फुफकार और अंदाज से सामंतो से सताई पूरी आवादी पे प्राण फंक कर राजनीति का  एक नया फलक तैयार किया। आज की राजनीति में भले तमाम राजनितिक दल जातीय रणनीति को साधकर आगे बढ़ते जा रहे हैं लेकिन वह सच यही है कि उस जाट को ताकतवर बनाने में लालू के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। 
    लालू टूटते नहीं। लगातार पाँच चुनावों (फरवरी 05 व अक्टूबर 05 का विधानसभा चुनाव, 09 का लोस चुनाव, 10 का विस चुनाव एवं 14 का लोस चुनाव) में करारी हार के बाद आदमी सत्ता के गलियारे में अलबला के न जाने किस-किस से हाथ मिलाने को तैयार हो जाता है, मगर लालू प्रसाद ने भाजपा के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। इसीलिए, वे जॉर्ज फर्णांडिस, शरद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार से कहीं ज़्यादा बड़े नेता के रूप में अक़्लियतों के बीच स्थापित हैं। ऐसा नहीं कि जॉर्ज-शरद-रामविलास-मुलायम की पहले की लड़ाई को लोग भूल गये हैं या उसकी क़द्र नहीं है। लेकिन, सामाजिक न्याय साम्प्रदायिक सौहार्द के बगैर अधूरा रहेगा। लालू प्रसाद के प्रति मेरी अपनी आलोचनाएँ हैं, पर सियासी मूल्यांकन सदैव निरपेक्ष नहीं हो सकता। देश की मौजूदा परिस्थिति में मेरी यही मान्यता है। यह भी सच है कि जम्हूरियत में चुनाव ही सबकुछ नहीं है, सामाजिक-सांस्कृतिक जागृति के लिए उत्तर भारत में व्यापक स्तर पर कोई पहल कम ही हुई है।
       याद रखिये बाक़ी बातें एक तरफ, लालू प्रसाद का सेक्युलर क्रेडेंशियल एक तरफ।  90 के बाद बिहार में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ । मौजूदा हालात में जहां धर्मनिरपेक्ष देश को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की जबरन कोशिश की जा रही है, वैसे में सामाजिक फ़ासीवाद से जूझने का जीवट रखने वाले नेता कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते।
श्री कृष्ण सिंह के बाद अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने वाले लालू प्रसाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री हैं। हां, अंतर्विरोधों से दो-चार होना भारतीय लोकतंत्र की नियति बनती जा रही है, जो कचोटती है। जिसने संचय-संग्रह की प्रवृत्ति से पार पा लिया, वह संसदीय राजनीतिक इतिहास में कर्पूरी ठाकुर-मधु लिमये की भांति अमर हो जाएगा। ऐसे त्याग की भावना के साथ जनसेवा करने वाले जनता के नुमाइंदे विरले आते हैं। पलटने में माहिर नीतीश कुमार तक ने इसी साल कहा, "लालू जी का जीवन संघर्ष से भरा है। वे जिस तरह के बैकग्राउंड से निकलकर आए हैं और जिस ऊंचाई को हासिल किया है, वह बहुत बड़ी बात है"।
          90 के दौर में जब आडवाणी जी रथयात्रा पर निकले थे और बाबरी को ढहाने चले थे, तो लालू प्रसाद ने उन्हें समस्तीपुर में नाथ दिया था। अपार जनसमूह व सभी राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी में पटना की एक विशाल रैली में वे कहते हैं, "चाहे सरकार रहे कि राज चला जाए, हम अपने राज्य में दंगा-फसाद को फैलने नहीं देंगे। जहां बावेला खड़ा करने की कोशिश हुई, तो सख्ती से निपटा जाएगा। 24 घंटे नज़र रखे हुए हूँ। जितनी एक प्रधानमंत्री की जान की क़ीमत है, उतनी ही एक आम इंसान की जान की क़ीमत है। जब इंसान ही नहीं रहेगा, तो मंदिर में घंटी कौन बजाएगा, जब इंसान ही नहीं रहेगा तो मस्जिद में इबादत देने कौन जाएगा ?"
         एक बार पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर ने सदन में कहा था, जो आज सत्ता पक्ष के लोगों को भूलना नहीं चाहिए, "एक बात हम याद रखें कि हम इतिहास के आख़िरी आदमी नहीं हैं। हम असफल हो जायेंगे, यह देश असफल नहीं हो सकता। देश ज़िंदा रहेगा, इस देश को दुनिया की कोई ताक़त तबाह नहीं कर सकती। ये असीम शक्ति जनता की, हमारी शक्ति है, और उस शक्ति को हम जगा सकें, तो ये सदन अपने कर्त्तव्य का पालन करेगा।"
जब अधिकांश लोग सेना बुला कर लालू प्रसाद को गिरफ़्तार करने पर 'भ्रष्टाचार' की ढाल बनाकर चुप्पी ओढ़े हुए थे और नीतीश जी जैसे लोग उल्टे इस क़दम के पक्ष में सदन में हंगामा कर रहे थे, तो चंद्रशेखर ने लालू प्रसाद मामले में सीबीआइ द्वारा अपने अधिकार का अतिक्रमण करने, न्यायपालिका को अपने हाथ में लेने व व्यवस्थापिका को अंडरएस्टिमेट करने के अक्षम्य अपराध पर लोकसभा में बहस करते हुए जो कहा था, उसे आज याद किये जाने की ज़रूरत है -
        "लालू प्रसाद ने जब ख़ुद ही कहा कि आत्मसमर्पण कर देंगे, तो 24 घंटे में ऐसा कौन-सा पहाड़ टूटा जा रहा था कि सेना बुलाई गई ? ऐसा वातावरण बनाया गया मानो राष्ट्र का सारा काम बस इसी एक मुद्दे पर ठप पड़ा हुआ हो। लालू कोई देश छोड़कर नहीं जा रहे थे। मुझ पर आरोप लगे कि लालू को मैं संरक्षण दे रहा हूँ। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरी दिलचस्पी किसी व्यक्ति विशेष में नहीं है, ऐसा करके मैं इस संसदीय संस्कृति की मर्यादा का संरक्षण कर रहा हूँ। जब तक कोई अपराधी सिद्ध नहीं हो जाता, उसे अपराधी कहकर मैं उसे अपमानित और ख़ुद को कलंकित नहीं कर सकता। यह संसदीय परंपरा के विपरीत है, मानव-मर्यादा के अनुकूल नहीं है।
         किसी के चरित्र को गिरा देना आसान है, किसी के व्यक्तित्व को तोड़ देना आसान है। लालू को मिटा सकते हो, मुलायम सिंह को गिरा सकते हो, किसी को हटा सकते हो जनता की नज़र से, लेकिन हममें और आपमें सामर्थ्य नहीं है कि एक दूसरा लालू प्रसाद या दूसरा मुलायम बना दें। भ्रष्टाचार मिटना चाहिए, मगर भ्रष्टाचार केवल पैसे का लेन-देन नहीं है। एक शब्द है हिंदी में जिसे सत्यनिष्ठा कहा जाता है, अगर सत्यनिष्ठा (इंटेग्रिटी) नहीं है, तो सरकार नहीं चलायी जा सकती। और, सत्यनिष्ठा का पहला प्रमाण है कि जो जिस पद पर है, उस पद की ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए, उत्तरदायित्व को निभाने के लिए आत्मनियंत्रण रखे, कम-से-कम अपनी वाणी पर संयम रखें। ये नहीं हुआ अध्यक्ष महोदय।''
     सब कुछ साफ़ है। इतिहास करवट लेता है। राजनीति बदलती है। लेकिन इतिहास पुरुष कम ही पैदा होते हैं। लालू इतिहास पुरुष के रूप में भारतीय राजनीति का एक चेहरा है जिसे भुला पाना मुश्किल होगा। 

No comments:

Post a Comment