Wednesday, January 3, 2018

और कफ़न के लिए चार दिनों तक शव पड़ा रहा ----

अखिलेश अखिल 
गरीबी क्या चीज है इसकी असलियत वही जाने जो गरीबी को जिया हो। ज़िंदा रहते तो इंसान अमीर -गरीब वर्ग में बंटा होता है,जातिगत भेगभाव से लेकर धार्मिक आधार पर एक दूसरे से विभक्त रहता है लेकिन मरने के बाद सबकी गति एक ही होती है। कफ़न के साथ मृत आत्मा का दाह  संस्कार।  हिन्दू रिवाज तो कुछ ऐसा ही कहता है। लेकिन मरने के बाद भी हमारे ही देश में बहुतों को कफ़न भी नसीब नहीं होता। इसे पूर्व जन्म का कर्म कहें या फिर गरीबी -विपत्ति में जीने को अभिशप्त इंसान। पंजाब के जालंधर जिले के जालंधर जिले के लांब्रा गांव के पास अस्थाई घरों में रह रहे गरीब मजदूरों की बस्ती में हुयी चार लोगों की मौत की कहानी बहुत कुछ कह जाती है। दुर्घटना से हुयी ये मौत पर भले की किसी का बस नहीं रहा हो लेकिन मौत के बाद कफ़न के अभाव में मृतक का दाह  संस्कार चार दिनों तक नहीं होना हमारे देश की सामाजिक ,नैतिक ,आर्थिक ,धार्मिक और कथित मानवता की पोल खोलकर रख देती है। सरकार की उन तमाम योजनाओं की असलियत सामने ला देती है जिसके दम पर हमारे देश के नेता और अफसर लोग राजनितिक रोटियां सकते नजर आते हैं। उस हिन्दुवाद और धर्मवाद की कलई खुल जाती है जो इंसानियत और मानवता से ज्यादा धरम को महत्व देते फिरते हैं। पंजाब की यह घटना मुंशी प्रेमचंद की कहानी कफ़न की याद दिलाती है जिसमे बुधिया की मौत गरीबी से जूझते हुए प्रसव पीड़ा के दौरान हो जाती है और गरीब ,बेवस ,लाचार किन्तु कामचोर उसका पति माधव और ससुर घीसू कफ़न के लिए  दान में मिले पैसे को भी दारु पीकर खर्च कर देता है। लेकिन जालंधर की घटना ऐसे ग़रीब परिजनों से जुड़ा है जो दिन रात काम करके पेट तो पालते हैं लेकिन कफ़न के पैसे का जुगाड़ नहीं कर पाते और शव को चार दिनों तक घर में ही रखने को विवश हैं। हो सकता की मृतक के परिजनों के लिए गरीबी और पैसे ना होने की विवशता हो लेकिन उस समाज और सरकार को क्या कहा जाय जो मठ ,मंदिरो ,गुरुद्वारों से लेकर धरम के नाम पर तीर्थस्थलों में अमीरी का दिखावा करने से बाज नहीं आते। 
     पंजाब जालंधर के लुम्ब्रा गाँव की यह घटना इंसानियत को शर्मसार करने वाली है। तीन दिन पहले 40 साल के दिलीप सिंह की मौत सड़क दुर्घटना में हो गई थी, लेकिन परिजनों के पास कफन के लिए पैसे न होने से घरवाले तीन दिन से शव को घर में ही रखना पड़ा । दिल को झकझोर देने वाली  इस घटना का पीड़ित सिर्फ एक ही परिवार नहीं है। दिलीप सिंह की पत्नी  रात को शव के पास लेटती रही  ताकि कोई जानवर  शव को न नोच डाले। उनकी एक तीन साल की बेटी थी अंजली, उसकी भी मौत हो चुकी है लेकिन चार दिनों तक उसका अंतिम संस्कार भी नहीं हो सका। दलीप सिंह की पत्नी पालम ने बताया कि उसके पास इतने पैसे नहीं है कि वह दोनों का अंतिम संस्कार कर सके। किसी कारण से पालम की भी एक टांग फ्रक्चर्ड है और वह अपना भी इलाज नहीं करा सकती।
इस घोर लाचारी का शिकार पालम अकेली नहीं है बल्कि मुहल्ले में रह रही 21 साल की नीलम भी उसी  दुर्घटना में विधवा हो गई है जिस दुर्घटना में दिलीप सिंह समेत पांच  लोगो की जाने चली गयी।  नीलम के  पति 23 वर्षीय मोहिंदर की भी  सड़क दुर्घटना में मौत हो गई । मोहिंदर का शव भी  घर में चार दिनों तक रखा हुआ था । नीलम सात माह की गर्भवती है और उसके पास भी पति का अंतिम संस्कार करने के लिए पैसे नहीं हैं।
 जिस दुर्घटना में पांच लोगों की मौत हुई है उनमें से सिर्फ एक अंतिम संस्कार किया गया , जबकि चार लोगों के शव मंगलवार तक उनके घर पर ही रखे रहे।मंगलवार को घटना की जानकारी मिलने के बाद रेड क्रॉस सोसाइटी की ओर से प्रत्येक पीड़ित परिवार को 4000 रुपए दिए गए ताकि वह अपने परिजन का अंमित संस्कार कर सकें। एक मृतक के भाई  बताया कि वह बहुत ज्यादा गरीब हैं। उनके पास अंतिम संस्कार तक के लिए पैसे नहीं हैं। सभी पीड़ित परिवार जालंधर जिले के लांब्रा गांव के पास अस्थाई घरों में रहते हैं। सभी लोग यहां मजदूरी कर जीवन यापन कर रहे थे। बताया जा रहा है कि हादसा जब हुआ जब तीन परिवारों के कुछ लोग पास के चर्च में क्रिसमस मनाने एक ऑटो से जा रहे थे। तभी दूसरा ऑटो उनके ऑटो से भिड़ गया। इस हादसे में दोनों ऑटो में सवार लोगों में 5 की मौत हो गई जिसमें एक ऑटो चालक भी शामिल है।
   घटना की जानकारी मिलने के बाद सरकारी अमलों ने मृतक के परिजनों को सहायता देने की बात कही है। आगे देखना होगा कि सरकार के लोग किस तरह की सहायता करते हैं। लेकिन सावल यह है कि हमारे देश में ऐसे ही करोडो उन लोगों का भविष्य क्या है जो दिन रात म्हणत करने के बाद भी कफ़न के पसे इकठ्ठे नहीं कर सकते। फिर आजाद भारत में हम जो भी बातें करते फिरते हैं वह सब ठगी और जुमलेबाजी से ज्यादा कुछ भी तो नहीं। 

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