Monday, January 15, 2018

इस दूसरे माउंटेन मैन ने लोकतंत्र के शापित गाँव का किया उद्धार

अखिलेश अखिल 
हमारे देश में राजनीतिक  खेल तो बहुत होते हैं।वोट की राजनीति के चक्रव्यूह में जनता को फसाकर बहुरूपिये  नेताओं ने जिस तरह से इस लोकतंत्र का गला घोंटा  है और वादों से इतर राष्ट्र के साथ छलावा किया है ,कहीं और देखने को शायद ही मिले। लेकिन क्रूसेडर को किसी के वादे और किसी की मदद की जरुरत नहीं होती। क्रूसेडर ही इतिहास रचते हैं और इतिहास में दर्ज भी होते हैं। ओडिशा में इन दिनों एक क्रूसेडर ,नायक और हीरो  पूरी दुनिया को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है। नाम है जालंधर नायक। बिहार के दशरथ मांझी की तरह नायक  ने साबित किया है कि वे भी माउंटेन मैन के खिताब के काबिल हैं। 45 वर्षीय नायक पहाड़ काटकर अपने गांव गुमसाही को फुलबनी  की सड़क से जोड़ा है जो कि कंधामल जिले में स्थित है।
      हम नायक की वीरता भरी कहानी से आपको परिचय कराएंगे लेकिन सबसे पहले नायक गाँव की तस्वीर से आपको परिचय करा दे।  गुमसाही को आप आजाद  भारत का सबसे उपेक्षित गाँव कह सकते हैं। विकास का कोई नामोनिशान  नहीं है यहां। विजली ,पानी ,स्वास्थ्य और शिक्षा की पहुँच आज तक यहां नहीं हो पायी है। कोई भी सरकारी योजना नहीं पहुंची। आजतक कोई भी सरकारी अमला यहां नहीं आया। लोकतंत्र के नाम पर भले ही यहां विकास नहीं पहुंचा हो लेकिन राजनीतिक झंडे -बैनर इस गाँव में जरूर दिख जाते हैं। गाँव के लोग नंग धरंग मिलेंगे। पुरुष और महिलाये कम से कम कपड़ों में अपनी इज्जत को ढकने को ही मजबूर मिलेंगे। मजदूरी और खेती बारी मुख्य पेशा है गाँव का। गरीबी इतनी कि दरिद्रता भी शरमा जाय। बावजूद इसके नयी पीढ़ी के लोग अपने बच्चो को पढ़ाने को लालायित हैं। गाँव में चुकी स्कूल नहीं है तो बच्चे 8 किलोमीटर दूर पढ़ने तो जाते हैं लेकिन पहाड़ी और पथरीला रास्ता बच्चो के लिए ना सिर्फ घातक है वल्कि जानलेवा भी। बस बच्चे पढ़ जाए ताकि गाँव की तक़दीर और तस्वीर बदले इसी सपने को पाले नायक ने पहाड़ काटने का बीड़ा उठा लिया।  गाँव के लोग हंसते थे लेकिन नायक के कदम बढ़ते गए और 2 साल में पहाड़ को काटकर रास्ता निकाल ही दिया। नायक का बनाया 8 किलोमीटर का रास्ता आज ठहाका लगा रहा है। सरकारी अमले सब कुछ देख कर मुरझा रहे हैं। 
        यह बात और है कि सड़क को बनाने में नायक को दो साल का समय लगा।  नायक ने कहा कि उसे इस अत्यंत कठिन काम को करने की प्ररेणा अपने बच्चों के कारण मिली, जो कि मुश्किलों से भरे पहाड़ के रास्ते से होते हुए शहर पढ़ने के लिए जाते थे।नायक नहीं चाहते थे कि उसके बच्चे परेशानी झेलें, इसलिए उसने उनके स्कूल जाने वाले रास्ते में आने वाले पत्थर -पहाड़ को काटकर रास्ता बना डाला।  नायक ने कहा “हमारे गांव में न तो कोई स्कूल है और न ही कोई आंगनवाड़ी है। शहर जाने के लिए हमें बहुत ही मुश्किल रास्ता पार करके जाना पड़ता था, इसलिए मैंने फैसला किया एक सड़क का निर्माण करुंगा।  एक बार मुझे अपनी गर्भपत्नी को डोला में बिठाकर छह किलोमीटर दूर अस्पताल ले जाना पड़ा था।”
      अब जिला प्रशासन ने फैसला किया है कि नायक को सम्मानित करने के लिए मनरेगा स्कीम के तहत उन्हें सपोर्ट किया जाएगा। जिला प्रशासन ने कहा कि पहाड़ तोड़कर सड़क का निर्माण करने की नायक के प्रयास और लगन से हम मंत्रमुग्ध है। नायक को पहाड़ तोड़कर सड़क का निर्माण करने में जितने भी दिन लगे हैं उसके लिए मनरेगा स्कीम के तहत उसे भुगतान किया जाएगा।  
     लेकिन सवाल ये है कि जब नायक गाँव के बच्चो की खातिर पहाड़ की छाती को चिर सकता है तो सरकारी अमले ऐसा क्यों नहीं कर सकते ? फिर आजतक ऐसा किया क्यों नहीं ? लोकतंत्र के नाम पर झूठतंत्र के जरिये जनता को लूटने वाली सरकारें और बहकाकर अपनी रोटी सेकने वाली राजनीति अगर नायक से कुछ सिख ले तो इस देश का भला हो सकता है। 

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