Wednesday, January 3, 2018

दलितों पर लगातार हमले और प्रधानसेवक की अंतहीन की चुप्पी


अखिलेश अखिल 
दलित हिंसा की घटनाएं पहले से कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी है। दलितों पर हमले और दलित महिलाओं के साथ प्रताड़ना के खेल सामंती समाज सवर्णवादी मानसिकता के तहत ही होते रहे हैं। जिसको जहां मौक़ा मिला दलितों को मूली गाजर की तरह रौंद डाला। सामंती समाज के लोग उसे इंसान की गरिमा कभी नहीं दी। छुआछूत ना करने  की पढ़ाई लोग पढ़ते रहे लेकिन छुआछूत के मामले बढ़ते ही चले गए। आज भी देश के कई इलाके ऐसे हैं जहां दलितों के साथ जानवर जैसा व्यवहार किया जाता है। उस राजस्थान को क्या कहेंगे जहां सामंतों के घर किसी की मौत हो जाती है तो दुःख जताने और रुदाली करने के लिए गुलाम रुदालियाँ बुलाई जाती है और दलित पुरुषों को मुंडन करना पड़ता है। गजब देश है यह। 
अभी पुणे की घटना बहुत कुछ कह जाती है। कोरेगाव ,भीमा की घटना की आग अब पुरे देश में फैलती जा रही है। आखिर कौन बढ़ा रहा है इसे ? क्या किसी नेता में इतनी ताकत नहीं कि जो अपनी एक आवाज पर इस धधकती आग को बुझा सके। लेकिन यहां नेता है कौन ? विधायक ,सांसद और मंत्री -संत्री की आखिर विसात ही क्या है ?वे केवल चुनाव जितने के तिकड़म जानते हैं और लोगों को बहका कर वोट बैंक की राजनीति करते दीखते हैं। क्या बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह में इतना दम है कि इस घटना को अपनी आवाज से रोक ले ? देश -दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का मुखिया होने के बावजूद अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो उनकी नेतागिरी किस काम की ? क्या राहुल गांधी इसे रोक पाएंगे ?  राहुल गांधी को तो अभी देश के लोगों ने पूरी तरह से नेता भी नहीं माना है। क्या मायावती ,शरद पवार ,नीतीश कुमार , उद्धव ठाकरे और ना जाने कौन कौन कुछ करने की हालत में हैं ? राजनीति तो यही कहती है कि किसी का घर भी जले तो उसको पहले चैन से देखो फिर बाद में आंसू बहाकर अपने मन मुताविक उसका लाभ उठा लोग। संभव है कि महाराष्ट्र की यह घटना कुछ राजनितिक दलों के लिए भी भविष्य का वोट व्यापार हो। 
   और हमारे प्रधानमन्त्री जी क्या कर रहे हैं ? उनकी आँखे क्या देख रही है। उनके कान कुछ सुन रहे हैं या नहीं ? उनके सलाहकार उन्हें क्या सलाह दे रहे हैं समझ से पड़े हैं। मन की बात करने वाले हमारे प्रधान सेवक को दलितों की चीख  पुकार क्यों नहीं सुनाई पड़ रही यह भी समझ से पड़े हैं। एक तरफ देश को विकसित बनाने में जुटे हैं पीएम साहब और दूसरी तरफ पूरा देश अभाव ,गरीबी ,अशिक्षा ,बिमारी ,असमानता ,बेकारी और दलाली जैसे रोगों से ग्रसित हैं। वर्ण भेद और जाती भेद के नाम पर राजनीति कुलांचे मार रही है। धर्म  गुंडागर्दी जारी है लेकिन प्रधानसेवक मौन साधे सब कुछ देख रहे हैं क्योंकि उन्हें तो हर बार चुनाव जितने का रंग सवार है। कांग्रेस मुक्त भारत करने का भूत सवार है। पुरे देश में भगवा झंडा गाड़ने  का रंग चढ़ा हुआ है।          एक समय था जब दलितों पर अत्याचार होने पर मोदी सार्वजनिक रूप से बयान जारी किया करते थे। जब दलितों पर हमले हो रहे थे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा था कि अगर किसी को हमला करना हैं तो मुझ पर करें लेकिन दलितों पर नहीं। लेकिन मुंबई में दलित हिंसा पर उनकी चुप्पी को लोकसभा में चुनौती दी जा रही है। वर्ष 2014 में केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद दलित हिंसा के कुछ मामलों ने सरकार की किरकिरी कर दी। कांग्रेस ने संसद में आरोप लगाया कि जहां-जहां बीजेपी की सरकारें हैं वहां दलितों का उत्पीड़न बढ़ा है। हालांकि, महाराष्ट्र की घटना के लिए बीजेपी ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर निशाना साधा। लेकिन अगर गौर करें तो देश के अलग-अलग राज्यों में दलितों पर हमले की घटनाएं लगातार चर्चा में हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों पर कई ऐसे उत्पीड़ने के मामले सामने आए, जिन्हें लेकर बड़े स्तर पर हंगामा हुआ। 
             महाराष्ट्र के पुणे में भीमा-कोरेगांव की ऐतिहासिक लड़ाई की 200वीं सालगिरह पर 1 जनवरी को कुछ दलित समूहों द्वारा एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। आरोप है कि कुछ कथित तौर पर हिंदुवादी संगठनों द्वारा हिंसक हमले किए गए। कार्यक्रम में आए दलितों की गाड़ियां जला दी गईं और उन्हें मारा पीटा गया। इस हमले में एक की मौत हो गई। हिंसा से गुस्साए दलित समूहों ने सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन किया और मुंबई को पूरी तरह से ठप्प कर दिया। इसके बाद महाराष्ट्र जातीय हिंसा की आग के शोलों में झुलस गया। बुधवार को दलित नेता प्रकाश अंबेडकर ने महाराष्ट्र बंद का ऐलान किया, इसका असर ये रहा कि पूरा प्रदेश बंद और आंदोलनकारी सड़क पर उतरकर अपने गुस्से का इजहार किया।
            गुजरात मॉडल की नरेंद्र मोदी द्वारा देश भर में बखान किया गया। लेकिन सच्चाई कुछ और ही निकली। मोदी के गृहराज्य गुजरात में ऊना की घटना ने देश को शर्मसार कर दिया था। 11 जुलाई 2016 को गुजरात के ऊना में कुछ दलित युवकों को मृत गाय की चमड़ी निकालने की वजह से गौ रक्षक समिति का सदस्यों ने सड़क पर बुरी तरह पीटा। दलितों की पिटाई का वीडियो भी जारी किया था। ऊना की इस घटना के बाद प्रदेश के दलित समाज के युवा सड़क पर विरोध प्रदर्शन करने उतरे। यहां तक कि उन्होंने मरी हुई गायों को उठाने से मना कर दिया। ऊना की घटना को लेकर दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने आंदोलन किया और उन्हें दलितों के साथ मुस्लिमों का भी सहयोग मिला। इस घटना की आवाज संसद में गूंजी तो मोदी सरकार बैकफुट में नजर आई। गुजरात चुनाव में जिग्नेश मेवाणी ने बीजेपी के खिलाफ प्रचार किया। चुनाव लड़ा और जीत कर विधानसभा पहुंचे हैं।
                 उत्तर प्रदेश की सत्ता पर योगी आदित्यनाथ के विराजमान होने के एक महीने बाद ही सहारनपुर के शब्बीरपुर में राजपूत-दलितों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। पहले 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के दौरान सहारनपुर के दुधली गांव में शोभायात्रा निकालने के दौरान दो गुटों में संघर्ष हुआ। इसके बाद 5 मई को महाराणा प्रताप जयंती के मौके पर शब्बीरपुर के पास गांव सिमराना में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अवसर पर ठाकुरों ने महाराणा प्रताप शोभायात्रा और जुलूस निकाला। दलित समाज के लोगों ने विरोध किया और जुलूस निकलने नहीं दिया। यहीं से बात बिगड़ी और शब्बीरपुर में दलितों और ठाकुरों के बीच हुई तनातनी ने उग्र रूप धारण कर लिया, जिसके चलते दोनों पक्षों के बीच पथराव, गोलीबारी और आगजनी भी हुई। क्षत्रिय समाज के लोगों ने दलितों के घरों को तहस नहस कर दिया। इस मामले में करीब 17 लोग गिरफ्तार हुए। दलित नेता चंद्रशेखर रावण मुख्य आरोपी के तौर पर अभी भी जेल में हैं।
              हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे दलित छात्र रोहित वेमुला ने 17 जनवरी 2016 को आत्महत्या कर ली थी। हैदराबाद विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने नवंबर 2015 में पांच छात्रों को हॉस्टल से निलंबित कर दिया था, जिनके बारे में कहा गया था कि ये सभी दलित समुदाय से थे। कहा गया था कि कॉलेज प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई के कारण रोहित वेमुला ने आत्महत्या की। इसके बाद देश भर में दलित सुमदाय के लोगों और छात्रों ने रोहित की आत्महत्या को लेकर विरोध प्रदर्शन किया और बीजेपी सरकार को कठघरे में खड़ा किया।
            हरियाणा में भी बीजेपी की सरकार है। प्रदेश के फरीदाबाद जिले के सुनपेड़ गांव में एक दलित परिवार को जिंदा जला दिया गया। इस घटना में दो बच्चों की मौत हो गई थी और कई लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए थे। सुनपेड़ गांव में करीब 20 फीसदी आबादी दलितों की है और 60 फीसदी सवर्ण हैं। कहा जाता है कि सवर्ण परिवार के लड़के दलित परिवार को परेशान कर रहे थे। एक पुरानी रंजिश के मामले में गांव के सवर्ण जाति के लोग दलित जितेंद्र के घर दाखिल हुए और पेट्रोल डालकर पूरे परिवार को जिंदा जला दिया। इसमें दो बच्चों की मौत हो गई और बाकी परिवार के लोग आग में झुलस गए।
    आखिर ये सब हो क्या रहा है ?कौन करा रहा है ये दंगा फसाद ?इसमें राजनीति बाज की क्या भूमिका है ? पीएम मोदी को इस पर गौर करना चाहिए। वे देश के करता धरता हैं और उनकी समझ आम लोगों से ज्यादा है क्योंकि उनके पास हर तरह का तंत्र है।  देश को बचाना पहला कर्त्तव्य है और इस काम में किसी तरह की राजनीति देश को बर्बाद कर सकती है। 

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