Monday, January 15, 2018

अब सिर्फ तीनमूर्ति नहीं तीनमूर्ति हाइफा कहिये जनाब !

अखिलेश अखिल 
देश की शान दिल्ली स्थित तीन मूर्ति चौक अब पहले वाला नहीं रहा। हमारे दोस्त इस्रायल के हाइफा शहर का नाम भी अब इससे जुड़ गया है। तीनमूर्ति का नाम अब तीन मूर्ति हाइफा हो गया है। कहते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान (1914-1918) भारतीय सैनिकों ने अपनी वीरता और साहस का परिचय देते हुए इजरायल के हाइफा शहर को आजाद कराया था। भारतीय सैनिकों की टुकड़ी ने तुर्क साम्राज्य और जर्मनी के सैनिकों से मुकाबला किया था और उसे हराया था। कहते हैं कि  इजरायल की आजादी का रास्ता हाइफा की लड़ाई से ही खुला था, जब भारतीय सैनिकों ने सिर्फ भाले, तलवारों और घोड़ों के सहारे ही जर्मनी-तुर्की की मशीनगन से लैस सेना को धूल चटा दी थी। इस युद्ध में भारत के 44 सैनिक शहीद हुए थे। 
   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे के बाद तीन मूर्ति चौक का नाम बदलने की अटकलें तेज हो गई थीं। आपको बता दें कि भारत के तीन राज्यों (जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर) से इजरायल में भेजे गए सैनिकों के नाम पर तीन मूर्ति चौक का नाम रखा गया था। देश दुनिया के लोग जब भी दिल्ली आते हैं तीन मूर्ति जरूर जाते। अब इस टीम मूर्ति को देखकर हाइफा की लड़ाई को भी लोग याद करेंगे। भारत और इस्रायल की दोस्ती की यह एक मिसाल है। 
 आपको बता दें कि   तीन मूर्ति भवन में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू का आवास था। उनके बाद में उनकी स्मृति में इसे संग्रहालय के रूप में बदल दिया गया है। उनके जीवन की झलक आज भी यहाँ उनके छाया-चित्रों में देखी जा सकती है। सीढ़ीनुमा गुलाब उद्यान एवं एक दूरबीन यहां के प्रमुख आकर्षण हैं। इसी गुलाब उद्यान से नेहरु जी अपनी शेरवानी का गुलाब चुना करते थे। यहाँ हर शाम ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम का आयोजन भी होता है। ट्रिस्ट विद डेस्टिनी जिसमें उनके जीवन और स्वतंत्रता के इतिहास के बारे में बताया जाता है। नेहरु जी के जीवन से संबंधित बहुत सी वस्तुएं यहां संरक्षित रखी हुई हैं। इतिहास के साक्षी बहुत से समाचार पत्र, जिनमें ऐतिहासिक समाचार छपे हैं, उनकी प्रतियां, या छायाचित्र भी यहां सुरक्षित हैं। इन सबके साथ ही पंडित नेहरू को मिला भारत रत्नभी प्रदर्शन के लिए रखा हुआ है।
      भवन एक चौराहे से लगा हुआ बना है, जहाँ तीन मूर्ति मार्ग, साउथ एवेन्यु मार्ग एवं मदर टेरेसा क्रीज़ेन्ट मार्ग मिलते हैं। इस चौराहे के मध्य में गोल चक्कर के बीचों बीच एक स्तंभ के किनारे तीन दिशाओं में मुंह किये हुए तीन सैनिकों की मूर्तियाँ लगी हुई हैं। ये द्वितीय विश्व युद्ध में काम आये सैनिकों का स्मारक है। इस स्मारक के ऊपर ही भवन का नाम तीन मूर्ति भवन पड़ गया है। पहले ये मूल भवन भारत में ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ़ का आवास हुआ करता था, जिसे फ़्लैग-स्टाफ़ हाउस कहते थे। यह ऑस्ट्योर क्लासिक शैली में निर्मित है। इस शैली का दूसरा भवन दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस है।  भवन परिसर में ही पश्चिमी ओर फ़ीरोज़ शाह तुगलक निर्मित कुशक महल संरक्षित स्मारक है। पंडित जी की मृत्यु उपरांत 1964  में इसे उनका स्मारक बना दिया गया है।
तीन मूर्ति भवन के परिसर में ही नेहरू तारामंडल बना है। यहां ब्रह्मांड, तारों, सितारों और खगोलीय घटनाओं को वैज्ञानिक तकनीक से एक अर्ध-गोलाकार छत रूपी पर्दे पर देखा जा सकता है। भारत के अन्य शहरों के तारामंडलों की अपेक्षा इस तारामंडल में बहुत ज्यादा सुविधाएं नहीं हैं तो भी वह लोगों को इस रहस्यमय दुनिया की झलक दिखाता है। नेहरू तारामंडल की कल्पना एवं योजना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बनायी थी। वे चाहती थीं कि बच्चों में विज्ञान को बढ़ावा दिया जाए। तारामंडल बनने से पहले यहां एक टेनिस कोर्ट हुआ करता था, जहां कभी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके भाई संजय गांधी अपनी किशोरावस्था में टेनिस खेला करते थे। तारामंडल की इमारत पत्थरों से बनी है जो पास ही बनी दूसरी ऐतिहासिक रचनाओं जैसी मुगलकालीन बनावट से एकरूपता रखती है। 
        प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छह दिन के भारत दौरे पर रविवार दोपहर दिल्ली पहुंचते ही इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू को एक बड़ा तोहफा दिया। मोदी ने दोनों देशों के संबंधों को एक नई मजूबती देने के लिए दिल्ली के तीन मूर्ति स्मारक में इजरायल के ऐतिहासिक शहर हाइफा का नाम जोड़ दिया। अब इस चौक का नाम 'तीन मूर्ति हाइफा' हो गया है। बेंजामिन नेतन्याहू, उनकी पत्नी और पीएम मोदी ने तीन मूर्ति हाइफा चौके पर शहीदों को श्रद्धांजलि भी दी।

No comments:

Post a Comment